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सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से किया किनारा..

gilani 1 सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से किया किनारा..

 

जम्मू कश्मीर से रवि कुमार की रिपोर्ट

केंद्र सरकार द्वारा पांच अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से धारा 370 को ख़त्म करने के बाद से कश्मीर में लगातार बदल रहे सियासी माहौल के बीच सोमवार सुबह अचानक एक ऐसी खबर सामने आयी जिसने कश्मीर और अलगाववादी खेमे की सियासत को एक बड़ा झटका दिया.

 

huriyat 2 सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से किया किनारा..

खबर थी कश्मीर में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफा देने की. सोमवार को गिलानी ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. सैयद अली शाह गिलानी जो पिछले अगस्त 2019 से घर में नजरबंद थे, ने अचानक ही हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया और खुद को पूरी तरह से ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से भी अलग कर लिया. गिलानी को हुर्रियत का आजीवन अध्यक्ष चुना गया था.

खुद द्वारा जारी एक ऑडियो संदेश में, गिलानी ने अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए कहा कि वह अलगाववादी समूह में “मौजूदा परिस्थितियों” के कारण ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से खुद को पूरी तरह से दूर कर रहे हैं.

गिलानी ने ऑडियो संदेश में कहा, “हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में मौजूदा स्थिति को देखते हुए, मैं अपने आपको इस फोरम से बिकुल अलग करने की घोषणा कर रहा हूं। इस संदर्भ में मैंने पहले ही फोरम के सभी घटकों को एक विस्तृत पत्र भेज दिया है. सैयद अली शाह गिलानी ने कैडर द्वारा “नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह” को एक कारण बताते हुए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफा दिया है.

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सदस्यों को लिखे पत्र में गिलानी ने यह भी कहा है कि वह इस फोरम के घटक सदस्यों के भविष्य के आचरण के बारे में किसी भी तरह से जवाबदेह नहीं होंगे. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सदस्यों को लिखे पत्र में गिलानी ने यह भी कहा है कि वह मंच के घटक सदस्यों के भविष्य के आचरण के बारे में किसी भी तरह से जवाबदेह नहीं होंगे.

huriyat 1 सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से किया किनारा..

गिलानी ने अपने पत्र में कहा कि उन्हें 2003 में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का प्रभार लेने के लिए घटक दलों द्वारा मजबूर किया गया था और बाद में उन्हें आजीवन अध्यक्ष बनाया गया था. गिलानी ने लिखा, “अनुशासन और अन्य कमियों को नजरअंदाज कर दिया गया और आपने (हुर्रियत सदस्यों) इतने वर्षों में एक मजबूत जवाबदेही प्रणाली स्थापित नहीं होने दी, लेकिन आज, आपने सभी सीमाएं पार कर ली हैं और नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह में शामिल हो गए हैं,” गिलानी ने कहा.

सैयद अली शाह गिलानी, जो 1990 के दशक से कश्मीर में अलगाववादी राजनीति का चेहरा रहे हैं और उन्होंने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का अध्यक्ष रहते हुए घाटी में कई अलगाववादी आंदोलनों का नेतृत्व किया है. गिलानी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कट्टर धड़े का नेतृत्व कर रहे थे, जबकि उदारवादी धड़े के सदस्य मौलवी मीरवाइज उमर फारूक थे.

90 वर्षीय गिलानी को कश्मीर में एक प्रमुख अलगाववादी नेता के रूप में देखा जाता रहा है, 2010 के बाद से गिलानी का ज्यादातर समय नज़रबंदी में बीता है. हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन 1993 में कश्मीर में अलगाववादी दलों के एक राजनीतिक मंच के रूप में बनाया गया था. हुर्रियत कांफ्रेंस 26 राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों का एक गठबंधन है.

आखिर क्या है वजह गिलानी द्वारा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से दशकों पुराना नाता तोड़ने की

जानकारों की माने तो गिलानी के इस्तीफे के पीछे उनकी बढ़ती उम्र और खराब तबीयत भी बड़ी वजह हो सकती है. 90 वर्ष के अलगाववादी नेता गिलानी की सेहत पिछले कुछ महीनों से ठीक नहीं चल रही है और इसी वर्ष फरवरी में उन्हें इलाज़ के लिए अस्पताल में भी भर्ती कराया गया था. इसके बाद कई बार उनकी तबीयत खराब होने की खबरें भी सामने आईं.

कहा यह भी जा रहा है कि केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर से धारा 370 को ख़त्म करने के बाद से गिलानी भारत सरकार द्वारा उठाए गए इस बड़े कदम का जवाब देने में नाकाम रहे जिसकी वजह से
उन्हें पाकिस्तान स्थित समूहों से भी कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा रहा था. घाटी में आये दिन सुरक्षाबलों के हाथों एनकाउंटर में मारे जा रहे आतंकियों और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में उनकी कमजोर होती पकड़ को भी जानकार उनके इस्तीफे का कारण मान रहे हैं.

माना जा रहा है कि जम्‍मू-कश्‍मीर से धारा 370 के खत्‍म होने के बाद से ही वहां पर प्रशासन कि तरफ से लगातार विकास के कामों में तेजी लायी गयी है और लोग खासकर युवा वर्ग इसी को देखते हुए अपने अच्छे भविष्य की उम्मीद कर रहा है और अलगाववाद का रास्‍ता छोड़कर विकास की राह को अपनाने का फैसला कर चूका है.

जानें कौन है सैयद अली शाह गिलानी

कश्मीर में आतंकी हिंसा को हमेशा जायज ठहराने वाले कट्टरपंथी नेता सईद अली शाह गिलानी का जन्म उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर टाउन के जैनगैर गाँव में 29 सितंबर 1929 को हुआ था. गिलानी ने अपनी शुरूआती पढ़ाई सोपोर से की और फिर लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान में) के ओरिएंटल कॉलेज में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की.

गिलानी पहले जमात-ए-इस्लामी कश्मीर का सदस्य रहे लेकिन बाद में उन्होंने तहरीक-ए-हुर्रियत के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की. बाद में उन्होंने जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी दलों के समूह, ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में काम किया. सैयद अली शाह गिलानी तीन बार (1972,1977 और 1987) जम्मू और कश्मीर के सोपोर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक भी रहे थे.

वर्ष 1993 को 26 अलगाववादी संगठनों ने मिलकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन किया और मीरवाइज मौलवी उमर फारुक को इसका पहला चेयरमैन बनाया गया. हुर्रियत कांफ्रंस में छह सदस्यीय कार्यकारी समिति भी बनायी गई थी जिसके द्वारा लिया गया कोई भी फैसला अंतिम माना जाता रहा है. हालांकि अन्य अलगाववादी नेताओं के साथ नीतिगत मतभेदों के चलते गिलानी ने अगस्त 2004 में अपने समर्थकों साथ मिलकर हुर्रियत का नया गुट बनाया जिसके साथ ही हुर्रियत में दो गट बन गए. सैयद गिलानी वाली हुर्रियत को कट्टरपंथी गुट तो मीरवाइज मौलवी उमर फारुक के नेतृत्व वाले गुट को उदारवादी गुट कहा जाने लगा.

क्यों लगातार सुर्ख़ियों में रहे सैयद अली शाह गिलानी

कश्मीर को लेकर उनके द्वारा दिए बयानों के चलते गिलानी लगातार विवादों में घिरे रहे हैं. चाहे उनका वो बयान जिसमे उन्होंने कहा था की हम पाकिस्तानी हैं और पाकिस्तान हमारा है, या फिर उनका यह कहना कि कश्मीर भारत का आंतरिक मुद्दा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है, इन सभी बयानों ने खूब सारी सुर्खियां बटोरीं थी. इसके इलावा गिलानी ने कश्मीर और पाकिस्तान को लेकर कई विवादित बयान दिए हैं. कश्मीर में संदिग्ध आतंकवादियों और नागरिकों की मौत की घटनाओं के विरोध में कई बार हड़ताल और कश्मीर बंद का आव्हान भी किया है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गिलानी समेत अन्य कई हुर्रियत नेताओं के खिलाफ लश्कर-ए-तैयबा से कथित तौर पर फंड लेने पर मामले में जांच भी की थी, गिलानी पर एनआईए ने आरोप लगाया था कि उन्‍होंने जम्मूृ-कश्मीर में विध्‍वसंक गतिविधियों के लिए उक्त आतंकी संगठन से पैसे लिए थे.

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वहीँ वर्ष 2019 में पुलवामा में सुरक्षाबलों पर लिए गए हमले के बाद, केंद्र सरकार ने गिलानी सहित कई पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है. प्रवर्तन निदेशालय ने गिलानी पर 14.40 लाख रूपए का जुर्माना लगाया और अवैध रूप से विदेशी मुद्रा को रकने के उनके खिलाफ विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (Foreign Exchange Management Act) के मामले में लगभग 6.8 लाख रूपए जब्त करने का आदेश दिया था.

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