बरेली की कारोबारी डॉ. विमला शुक्ला, शिक्षाविद डॉ. विमला शुक्ला, सक्सेस स्टोरी, भारत खबर, गर्व है बेटियों पर

लखनऊ।  कुछ लोग खुद में मिसाल होते हैं। जो काम हाथ में लेते हैं उसे बेमिसाल बनाने का हुनर होता है उनके पास। मुश्किलें, दिक्कतें, परेशानियां…ये लफ्ज होते ही नहीं हैं उनकी डिक्शनरी में। उद्यमी व शिक्षाविद डॉ. विमला शुक्ला ऐसे ही लोगों में शुमार हैं। उनकी जिंदगी की कहानी किसी सपने के सच होने जैसी है।

सुबह से शाम तक काम में उलझे रहने की आदत और हर परिस्थिति को खुद को मुताबिक बना देने का फन। दोनों में डॉ. विमला शुक्ला का कोई सानी नहीं है। 88 साल की उम्र में युवाओं जैसा जोश और खिलखिलाती हंसी। डॉ. विमला कहती हैं-मैंने कभी रुकना, हारना और थकना नहीं सीखा।

बरेली की कारोबारी डॉ. विमला शुक्ला, शिक्षाविद डॉ. विमला शुक्ला, सक्सेस स्टोरी, भारत खबर, गर्व है बेटियों पर

क्रांति की जमीन मेरठ में हुई पैदाइश

क्रांति की जमीन मेरठ में पैदा हुईं विमला शुक्ला के पिता एनडी तिवारी सेना में थे। सेना की नौकरी और ट्रांसफर का चोली दामन का साथ है। लगातार ट्रांसफर होने लगे तो पिता ने विमला और उनके भाई बहनों को पढ़ाई लिखाई के लिए इटावा शिफ्ट कर दिया।

हाईस्कूल पास करने के बाद बनीं जमींदार खानदान की बहू

हाईस्कूल पास करने के बाद पिताजी ने विमला की शादी आरआर शुक्ला से कर दी। आरआर शुक्ला जमींदार खानदान से थे। अब विमला के पास महल जैसा घर था और भरा पूरा परिवार।

आगे पढ़ने की इच्छा ने खोले दुनिया के दरवाजे

शादी के बाद विमला ने अपने पति के सामने आगे पढ़ने की इच्छा जताई। ससुराल के लोग पहले इसके लिए राजी नहीं हुए मगर बाद में मान गए। विमला ने इंटरमीडिएट के बाद बीए और फिर एमए किया। विमला कहती हैं, पति ने मेरा हर कदम पर सहयोग किया। उनके बगैर यह सब संभव नहीं था।

जिंदगी में कभी भी हारकर या थककर रुकना नहीं चाहिए। जिंदगी निरंतरता का नाम है। जो चलता रहता है वह कुछ न कुछ पाता है। जो लोग ठहर जाते हैं वो खत्म हो जाते हैं। हम सब ईश्वर की संतानें हैं। इस पर बात भरोसा कीजिए और अपनी मंजिल की तरफ चल पड़िए, सफलता जरूर मिलेगी।  

घर आकर अप्वाइंटमेंट लेटर दे गए शिक्षा विभाग वाले

उस दौर में महिलाओं का ग्रेजुएट होना बड़ी बात थी। विमला हिंदी और अंग्रेजी लिटरेचर से ग्रेजुएट थीं। ऐसे में शिक्षा विभाग वाले घर आकर उन्हें अप्वाइंटमेंट लेटर दे गए। उनकी पहला संस्थान था- फिरोजाबाद इंटर कॉलेज। नौकरी के बाद उन्होंने पीएचडी की और वह हो गईं- डॉ. विमला शुक्ला।

पहले कॉलेज में टीचर उसके बाद बनीं प्रिंसिपल

फिरोजबाद डिग्री कॉलेज में दो साल पढ़ाने के बाद उन्होंने अलीगढ़ के अतरौली इंटर कॉलेज में प्रिसिंपलशिप के लिए आवेदन किया। उनका चयन हो गया। इसके बाद तमाम कॉलेजों में पढ़ाती हुईं वह बरेली के साहू रामस्वरूप कॉलेज पहुंची। उस वक्त कॉलेज हाईस्कूल था। जो बाद में इंटर कॉलेज और फिर डिग्री कॉलेज बना।

रुहेलखंड यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए किया संघर्ष

डॉ. विमला शुक्ला बरेली में रुहेलखंड यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए संघर्ष करने वालों में भी शामिल रहीं। इसके अलावा वह एक्सचेंज ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर्स प्रोग्राम के तहत अमेरिका और इंग्लैंड भी गईं। बरेली में इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की संस्थापक सदस्य रहीं। अब भी वह सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हैं।

नौकरी के दौरान आया कारोबार का आइडिया

नौकरी के दौरान विमला शुक्ला को कारोबार का आइडिया आया। काफी रिसर्च के बाद उन्होंने बरेली के भोजीपुरा इंडस्ट्रियल एरिया में नॉर्दन इंडिया पैकेजिंग एंड प्रिंटिंग नाम से अपनी फैक्ट्री शुरू की।

88 साल की उम्र में में भी मुझे कोई दिक्कत नहीं है। आंखों से ठीक दिखता है। वाणी से ठीक बोल लेती हूं। कानों से ठीक सुनाई देता है और जितना चाहती हूं पैदल चल लेती हूं। मां की परवाह करने वाला बेटा और सास की इज्जत करने वाली बहू है। अपना चलता हुआ बिजनेस है और सरकारी पेंशन भी। अब इससे ज्यादा एक इंसान को भला क्या चाहिए। भगवान मुझ पर बहुत मेहरबान है। इसके लिए मैं उसकी शुक्रगुजार हूं।

1992 में रिटायर होने के बाद संभाला कारोबार

1992 में रिटायर होने के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह कारोबार पर फोकस कर दिया। उनकी फैक्ट्री पैकेजिंग और प्रिंटिंग का एक बड़ा नाम बन गई। अब भी वह अपने कारोबार में पूरी तरह सक्रिय हैं। डॉ. विमला अपने परिवार के साथ सिविल लाइंस की आवास विकास कालोनी में रहती हैं।

भीमताल में बना रही हैं टूरिस्ट कॉलेज

88 बरस में उम्र में वह उत्तराखंड के भीमताल में टूरिस्ट कॉटेज बना रही हैं। 1987 में उन्होंने भीमताल में जमीन खरीदी थी। अब उस पर आधुनिक टूरिस्ट कॉटेज बन रहे हैं। डॉ. विमला ने बताया, मुझे पहाड़ों से जुड़े रहना हमेशा से पसंद है। इस उम्र में भी पहाड़ मुझे अपनी तरफ खींचते हैं।

बेटा देखता है कारोबार बहू लखनऊ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर

विमला शुक्ला के बेटे सौरभ शुक्ला उनका कारोबार देखते हैं। उनकी बहू डॉ. शशि शुक्ला लखनऊ यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान विभाग की हेड हैं।

जब मैं अपने कॅरियर के पीक पर थी तो मैंने खुद से एक सवाल पूछा, रिटायरमेंट के बाद क्या करना है। जवाब मिला बिजनेस। मैंने एक फैक्ट्री खोलने की सोची। अब मेरे सामने अगला सवाल खड़ा हो गया। किस चीज की। इस पर मैंने रिसर्च की। मैंने देखा कि शराब और दूसरी चीजें जो बोतल और गत्तों में पैक होती है, वो हमेशा होती रहेंगी। इसकी डिमांड कम नहीं होगी। मैंने यही बिजनेस करने का फैसला लिया। भोजीपुरा में प्लॉट लेकर अपना काम शुरू कर दिया। आइडिया अच्छा था इसलिए बिजनेस अच्छा चल पड़ा।

खुद काम करने की आदत डालें, मिसाल बनते देर नहीं लगेगी

आप किसी भी क्षेत्र में हों। हमेशा खुद काम करने की आदत डालें। केवल दूसरों को आदेश न देते रहें। आप खुद काम करेंगे तो दूसरे लोग आपकी बात मानेंगे। आपको देखकर सीखेंगे। इसके लिए आपके अंदर जोश होना चाहिए। उम्र इसमें कभी बाधा नहीं बनती।

खुद बनाती हूं अपने लिए रोटी, सुकून मिलता है

पहले जमींदार परिवार में शादी और उसके बाद सारी जिंदगी प्रिंसिपलशिप। मैंने कभी एक गिलास पानी तक खुद नहीं भरा। मगर, उम्र के इस मोड़ पर मैं खुद के लिए खाना बनाने के साथ ही किचन के छोटे-मोटे काम भी खुद करती हूं। ऐसा करके खुद को सुकून मिलता है।

खुद को ब्रह़्म समझें, जान लें कुछ भी असंभव नहीं

विमला शुक्ला कहती हैं, जब हम खुद ही ब्रह्मा और शिव की संतानें हैं तो हमारे लिए दुनिया में कौन का काम असंभव है। अपना आचरण ठीक और इरादे साफ रखें। जो करना चाहें उसके लिए दिल से कोशिश करें। फिर देखिए, ईश्वर कैसे हर कदम पर आपका साथ देता है।

मैं इंग्लैंड गई, यह जानने के लिए कि जो अंग्रेज बरसों तक हम पर राज करते रहे वो आखिर हैं कैसे। वहां रही, लोगों जो जाना समझा। अमेरिका के लोग जितने सभ्य और अनुशासित हैं, इंग्लैंड के उससे बेहद कम। उनके अंदर ऐसी कोई विशेषता नहीं कि वो हम पर राज करते। ये तो हम थे जो आपस में बंटे हुए थे। एक दूसरे साथ देने की बजाए एक दूसरे को नीचा दिखाने में भरोसा रखते थे। इसलिए जो भी आया उसने हमें जीता और फिर हम पर राज किया।

मुस्कुराना मत भूलिए, वरना खुद को भूल जाएंगे

जिंदगी कैसे भी रंग दिखाए। चेहरे पर मुस्कान बनी रहनी चाहिए। खिलखिलाकर हंसना आपकी तमाम दिक्कतों को खत्म कर देता है। मगर, इस दौर में चेहरों से मुस्कान और रिश्तों से गर्माहट खत्म हो रही है। यह ठीक नहीं हैं। वह कहती हैं-

संबोधन में जीवन बीता, संबंधों में की बात कहां

सारे रिश्ते अब व्हाट्सअप और फेसबुक पर सिमट गए हैं। मगर मैं तो पुराने जमाने की हूं। हर बात पर बेलौस हंस देती हूं..फिर पूछती हैं, अब तुम ही बताओ, मुस्कुराने में भी भला कुछ जाता है क्या?

Exclusive: आपकी लापरवाही “कोरोना वारियर्स” का बढ़ा रही तनाव

Previous article

झारग्राम रैली में ममता बनर्जी ने फेंका पासा, जनता को लुभाने के लिए राज्य में फ्री कोरोना वैक्सीन

Next article

You may also like

Comments

Comments are closed.