November 30, 2022 5:02 pm
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जानें,सामान्य आरक्षण का विरोध और समर्थन करने के पीछे का राजनीतिक समीकरण

तेजस्वी यादव.. जानें,सामान्य आरक्षण का विरोध और समर्थन करने के पीछे का राजनीतिक समीकरण

एनडीए की  मोदी सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। लोकसभा में इस विधेयक के समर्थन में 323 सांसदों ने मतदान किया। जबकि विपक्ष में 3 वोट पड़े। विपक्ष में वोट डालने वालों में (AIADMK) के एम थंबिदुरई, आईयूएमएल (IUML) के ईटी मोहम्मद बशीर और एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी शामिल हैं। यदि राज्यसभा की बात की जाए तो बिल के पक्ष में 165 वोट पड़े। जबकि 7 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट दिए। राज्यसभा में में बिल के खिलाफ वोट देने वालों में राष्ट्रीय जनता दल  (आरजेडी) और  एआईडीएम के व डीएमके के सदस्यों का नाम शामिल है।

 

तेजस्वी यादव.. जानें,सामान्य आरक्षण का विरोध और समर्थन करने के पीछे का राजनीतिक समीकरण
जानें,सामान्य आरक्षण का विरोध और समर्थन करने के पीछे का राजनीतिक समीकरण

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राजद ( राष्ट्रीय जनता दल) के नेताओं ने इस विधेयक का खुलेतौर पर विरोध किया। इस बिल को दलित, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण को खत्म करने एक साजिश करार बताया। उन्होंने कहा कि 15 फीसदी सवर्ण आबादी को अगर 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने की कोशिश हो रही है तो फिर 52 फीसदी ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण के दायरे को बढ़ाया जाए। आरजेडी सांसद इस विधेयक का विरोध करते हुए लोकसभा से वॉकआउट कर गए। जबकि राज्यसभा में उन्होंने खिलाफ वोट किया है।

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आपको बता दें कि आरजेडी इस विधेयक के विरोध में अपने को खड़ा कर दलित-ओबीसी आरक्षण के सबसे बड़े समर्थक के तौर साबित करना चाहती है। मालूम हो कि आरजेडी ने इससे पहले 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी दलित और ओबीसी वोट को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी। आरजेडी ने अपनी छवि कभी सवर्ण समर्थक के तौर पर नहीं रखी है। माना जा रहा है कि राजद द्वरा इस विधेयक का विरोध करना बिहार के दलित और ओबीसी वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश है।

वहीं अगर AIADMK और डीएमके के विरोध के कारण पर गौर किया जाए तो राजनीतिक और जातीय समीकरण ही माना जा रहा है। तमिलनाडु में आरक्षण का दायरा पहले से ही 69 फीसदी है, जिसमें एससी, एसटी और ओबीसी शामिल हैं। इस आरक्षण के दायरे में तमिलनाडु की 87 फीसदी जनसंख्या आती है। यानी कि सूबे में सवर्ण समुदाय की आबादी बहुत कम है।

AIADMK और डीएमके के विरोध की वजह 87 फीसदी आबादी को ही माना जा रहा है। समर्थन करने वाले विपक्ष की बात की जाए तो कांग्रेस समेत अन्य दल मोदी सरकार के 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण का सीधे तौर पर विरोध करके सवर्णों को नाराज नहीं करना चाहते है। क्योंकि कांग्रेस तो पहले से ही सॉफ्ट सवर्णों के वोट पर फोकस कर रही है। इसका अंदाजा राहुल गाधी के उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें वह कहते हैं कि कांग्रेस में ब्राह्मणों का डीएनए है। और अपने को कॉल ब्राह्मण बताते हैं।

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