September 17, 2021 6:27 am
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प्रकृति की शान उत्तराखंड का हरेला पर्व, जानिए क्यों मनाया जाता है?

harela 1 प्रकृति की शान उत्तराखंड का हरेला पर्व, जानिए क्यों मनाया जाता है?

उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला आज पूरे उत्तराखंड में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। उत्तराखंड प्रकृति के तोहफों से संपन्न राज्य है। यहां की खूबसूरती ही उन्हीं बल्कि देवी देवता दुनियाभर में जानें जाते हैं। यही कारण है कि, उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में में हरेले से ही श्रावण मास और वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है। हरेले के तिनकों को इष्ट देव को अर्पित कर अच्छे धन-धान्य, दुधारू जानवरों की रक्षा और परिवार व मित्रों की कुशलता की कामना की जाती है। हरेले की पहली शाम डेकर पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है। आज उत्तराखंड में हरेला पर्व को मनाया जा रहा है। और खूब पेड़ लगाये जा रहे हैं।

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हरेला पर्व में क्या होता है?
कुमाऊं में हर साल सावन माह से पहले हरेला पर्व शुरू हो जाता है। जब किसी बर्तन या टोकरी में मिट्टी में अपने पारंपरिक अनाजों को बो देते हैं। ये अनाज आषाढ़ माह में हरेला पर्व से ठीक 10 दिन पहले बोया जाता है। इस समय गेँहू, जौ,मक्का, धान, तिल के अनाजों को बोया जाता है। कहीं जगह 7 और 9 अनाज भी बोए जाते हैं। इस तरह बीजों की उत्पादक क्षमता का भी पता चल जाता है। हरेले से पहली शाम डेकर यानी श्री हरकाली पूजन होता है। घर के आंगन से शुद्ध मिट्टी लेकर शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि की छोटी मूर्तियां तैयार की जाती हैं। उन्हें रंगने के साथ बाकायदा श्रृंगार किया जाता है। और इनकी पूजा की जाती है।हरेला पर्व में लोग अपने आस-पास पौधारोपण भी करते हैं।

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हरेला पर्व के दिन घर-घर में पहाड़ी पकवान बनाए जाते हैं। सभी गांव के मंदिर में एकत्रित होकर इस पर्व को सामाजिक सद्भाव के साथ मानते हैं। कुमाऊं क्षेत्र के अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, चम्पावत और पिथौरागढ़ जिलों में ऋतु परिवर्तन और धन्य-धान्य की समृद्धि के लिए हरेला लोक पर्व मनाया जाता है। आज हरेला के दिन इन सातों जिलों मे काफी उत्साह देखने को मिला वहीं लोगों ने आज उत्तराखंड में खूब पेड़ लगाये।

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