6666 किसान आंदोलन के अडिग 'सौ-दिन', कृषि कानून के विरोध में चल रहा प्रदर्शन

नई दिल्ली: सरकार के नए कृषि कानून के खिलाफ देश के किसानों का आंदोलन लगातार जारी है। इसी बीच किसानों का आंदोलन आज अपने 100 दिन पूरे कर चुका है। बहरहाल अभी भी किसान दिल्ली की सीमाओं में डटे हुए हैं। गौरतलब है कि बीते दिनों दिल्ली के सीमाओं में बैठे किसानों की संख्या तेजी से घट रही थी, लेकिन एक बार फिर किसान बड़ी संख्या में दिल्ली कूच कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने बढ़ाई सुरक्षा

जिसे देखते हुए दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा के मातहत कड़ा इंतजाम कर रखा है। इसी बीच, कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली के बॉर्डर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए हजारों किसान अमृतसर से दिल्ली के ​लिए रवाना हो रहे हैं।

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गर्मियों से बचने के लिए ट्रोलियों में लगे पंखे

किसान किसान बिल के विरोध में अडिग हैं वह किसी भी सूरत में दिल्ली मे चल रहे विरोध को रोकना नहीं चाह रहा है। इसी क्रम में किसान अब गर्मियों के मौसम को देखते हुए ट्रोलियों में पंख लगा लिए हैं। बात करें सिंधु बॉर्डर पर डटे किसानों की तो उन्होंने भी गर्मियों से बचने के लिए अपनी तरफ से कई तैयारी कर ली है। जिसमें किसानों ने गर्मियों के अनिरूप टेंट बनाया है। टेंट में फ्रिज औऱ पंखे लगाए गए हैं।

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सोशल मीडिया से आंदोलन को दें मजबूती- टिकैत

किसान नेता नरेश टिकैत ने कहा कि किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे हुए। देश के सभी किसान भाईयों के संघर्ष को सलाम। इतना ही नहीं जो किसान भाई दिल्ली नहीं आ सकते हैं वह कम से कम सोशल मीडिया के माध्यम से हम किसान भाईयों का हौंसलाअफजाई करते रहे। यह सहयोग भी किसान आंदोलन को मजबूती व शिखर पर पहुंचाएगा। 

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ये हैं संयुक्त मोर्चा का नया ऐलान

बता दें कि संयुक्त मोर्चा ने एक नया ऐलान किया है कि यूपी, उत्तराखंड के 16 जिलों में ट्रैक्टर मार्च की जाएगी। जिसमें 6 मार्च को मुजफ्फरनगर के रामराज से इसकी शुरूआत होगी। राकेश टिकैत इस ट्रैक्टर मार्च को दिखाएंगे हरी झंडी। इतना ही नहीं कृषि कानून के विरोध में जन जागरण भी किया जाएगा, जिसका 27 मार्च को गाजीपुर में समापन होगा। दिल्ली और हरियाणा के बीच सिंघु बॉर्डर पर अब बांस-बल्लियों के तंबुओं की जगह, स्टील के ढांचे और इनपर तंबू बांधे जाने की क़वायद शुरू हो चुकी है। कई टेंटों में एसी और कूलर लगाने का काम भी ज़ोरों से चल रहा है। सिमरनजीत सिंह, पंजाब के मोगा के रहने वाले हैं और पिछले तीन महीनों से भी ज़्यादा समय से वो सिंघु बॉर्डर पर दूसरे किसानों के साथ मिलकर आंदोलन कर रहे हैं।

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