UP: जेलों में सिर्फ सज़ा नहीं काट रहे कैदी, इनके काम जानकर आप भी करेंगे तारीफ   

लखनऊ: जेल की चाहरदीवारी में बंद कैदियों का नाम सुनकर लोगों के जहन में कुख्यात अपराधियों की तस्वीर झलकने लगती है, जो अपने किसी न किसी जुर्म की सजा काट रहे हैं। लेकिन अब यही कैदी जरायम की दुनिया को छोड़ जेल में फसल उगा रहे हैं। इसके अलावा यही कैदी जेलों में छोटे-छोटे उद्योग-धंधों से जुड़कर नई जिंदगी जीने का मकसद तलाश कर रहे हैं।

खेती के लिए मिली सुविधा

गौरतलब है कि यूपी की जेलों में लगभग 10,06,964 से ज्यादा कैदी सजा काट रहे हैं। इन कैदियों पर रोजाना 25 हजार कुंतल सब्जियों की खतप होती है। इसकी पूर्ति जेलर द्वारा होती है। जेल मेन्युअल के मुताबिक, आवश्यकता से ज्यादा सब्जियों की पैदावार होने पर जेल प्रशासन बंदी रक्षकों को नि:शुल्क सब्जी वितरित करता है। इसके अलावा जो सब्जियां बच जाती हैं, उसकी ब्रिकी कर शासकीय इनकम भी की जाती है।

आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-2020 में यूपी की जेलों में 23754.19 कुंतल आलू और 52766.44 कुंतल सब्जियों की पैदावार कर उत्पादन किया गया था। इन सब्जियों से 668.11 लाख की इनकम प्राप्त हुई थी। सब्जियों की पैदावार जेल की चाहरदीवारी में होती है। कैदी श्रमदान कर जेल में फसल उगाने का काम करते हैं।

जेल में खेती-बाड़ी करने के लिए जेल प्रशासन ने कैदियों को तमाम सुविधाएं भी मुहैया कराई हैं। इसके लिए यूपी की जेलों में 32 ट्रैक्टर, 95 नलकूप और 23 पंपिंग सेट भी हैं। वहीं, कई जेलों में नए नलकूप के साथ बोरिंग की भी स्वीकृति दी गई है। इसके अलावा जेलों में भूमि वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ सीडीओ यानि मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है।

सात जेलों में हो रही मसालों की बुआई

खासतौर से हल्दी, धनिया, मिर्च की पैदावार के लिए यूपी की सात जेलों में कृषि फॉर्मों को मसालों की बुआई के निर्देश दिए गए हैं। इन मसालों की पैदावार से इनकम के साथ प्रशासन पर पड़ने वाले वित्तीय भार में कमी आएगी। उप महानिरीक्षक कारागार बीपी त्रिपाठी के मुताबिक, यूपी की जेलों में फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए जमीन को बंजर नहीं होने देंगे।

उन्‍होंने कहा कि, इससे कुख्यात अपराधी जरायम की दुनिया को छोड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। वह जेलों में खुद के लिए सब्जी और अनाज की फसल बो रहे हैं। बीपी त्रिपाठी ने बताया कि, जिन जेलों में खेती के लिए जमीन नहीं है, उन जेलों में सब्जी व अनाज दूसरे जेलों से भेजा जाता है।

खेती के अलावा सीख रहे हुनर

सजायाफ्ता वाले कैदी जेल में खेती ही नहीं बल्कि तमाम लघु उद्योग का हुनर सीख रहे हैं। आगरा की सेंट्रल जेल के कैदी साबुन, फिनायल, दरी, सिलाई-कढ़ाई और ताजमहल के शोपीज बनाने का हुनर सीख रहे हैं। वहीं, प्रयागराज की नैनी जेल में कैदी कंबल, सिलाई, दरी, चादर, गमछा, डिटर्जेंट साबुन, संगम बॉथ शोप के अलावा सहारनपुर की तर्ज पर फर्नीचर और काष्ठकला का उद्योग चला रहे हैं।

इसी कड़ी में बरेली सेंट्रल जेल में कैदी कंबल, कपड़े, सिलाई-कढ़ाई, काष्ठकला उद्योग में आत्मनिर्भर बन रहे हैं। वाराणसी की सेंट्रल जेल में कैदी दरी, कपड़े सिलाई-कढ़ाई, स्टील के बर्तन, काष्टकला और लोहे के उद्योग के बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इसके अलावा सेंट्रल जेल फतेहगढ़ में सिलाई, दरी, प्रकीर्ण, रंगाई-छपाई उद्योग, लखनऊ आदर्श कारागार के कैदी पावरलूम, हस्त निर्मित कागज, प्रिटिंग प्रेस एवं सिलाई उद्योग को चला रहे हैं। वहीं, उन्नाव की जेल में कैदी सिलाई व दरी उद्योग को सीख रहे हैं। सीतापुर की डिस्ट्रिक्ट जेल में दरी उद्योग, गोरखपुर की जेल में सिलाई उद्योग को सीखकर रिहाई के बाद कैदी स्वाबलंबी बनने की राह पर चलने को तैयार हैं।

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