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जाने कैसे मिला ननों के विरोध को आलोचना की बजाय समर्थन, ताकतवर ईसाई संगठन ने की थी टिप्पणी

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केरल के एक ताकतवर ईसाई संगठन ने ननों को लेकर बिशप सांप्रदायिक टिप्पणी की थी। जिसका ननों ने विरोध किया और ननों का विरोध आलोचना की जगह समर्थन पाने लगा। ये विरोध आलोचना से ज्यादा समर्थन का केंद्र बन गया। अब ये विरोध चर्च से जुड़ी महिलाओं और पुरूषों के बीच के संघर्ष का प्रतीक बन गया है।

इतिहास में पहले कभी महिलाओं को चर्च में रविवार को विरोध करते नहीं देखा गया। ये विरोध बिशप की सलह पर हुई बहस के बाद होना शुरू हो गया। जिसमें कहा गया कि ईसाइयों को किसा और धर्म के लोगों के साथ बिजनेस नहीं करना चाहिए। बता दें कि कुछ दिन पहले कैथोलिक ईसाइयों की संस्था ‘साइरो-मालाबार कैथोलिक चर्च’ की पलाई इकाई के बिशप मार जोसेफ़ कल्लारांगट ने अपने एक धार्मिक उपदेश में “लव जिहाद” की तरह “नारकोटिक्स जिहाद” शब्द का इस्तेमाल किया था। लेकिन, सेंट फ्रांसिस कॉन्वेंट में ननों की मण्डली को दी अपनी सलाह में ये बिशप एक कदम और आगे बढ़ गए।

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वहीं सिस्टर अनुपमा ने कहा कि हमने उन्हें ऐसे उपदेश देने से मना किया कि हमने कहा कि कुछ लोगों के गुनाहों की वजह से पूरी मुसलमान बिरादरी को दोष देना गलत है। गलत लोग हर धर्म में शामिल है। जोसेफ़ कल्लारांगट ने अपने उपदेश में कहा कि आपको मुस्लिम होटलों से बिरयानी नहीं खानी चाहिए। या उनकी दुकानों से कुछ भी नहीं खरीदना चाहिए। यहा तक के उन्होंने ये भी कहा कि उनके रिक्शा से सफर भी नहीं करना चाहिए।

सिस्टर अनुपमा ने कहा, “हम छात्र है और हमें कभी मुसलमानों के रिक्शा में सफर करने से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई और हमारी सुरक्षा में जो मुस्लिम पुलिसवालो तैनात है उनसे कभी कोई परेशानी हुई। लेकिन, बिशप अपने नारकोटिक्स जिहाद और दूसरे बयानों पर अड़े रहे। बिपश का ये बयान पोप की राय के भी खिलाफ है। नसिस्टर अनुपमा, सिस्टर एल्फी, सिस्टर एंकिट्टा और सिस्टर जोसेफिन ने ही सितंबर 2018 में एक ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की थी। उन्होंने बिशप रैंक के एक ऐसे पादरी को चर्च में बहाल रखने के ख़िलाफ़ विरोध किया था जिन पर एक नन के बलात्कार का आरोप था।

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ये दोनों विरोध अपनी जगह पर हैं, पर इससे पता चलता है कि चर्च के अंदर कैसे बदलाव हो रहे हैं। धर्म से जुड़ी ये महिलाएं कई तरीक़े से पुजारियों के दबदबे का विरोध कर रही हैं। एक नन ने बताया कि चाहे यौन उत्पीड़न का मामला हो, या छलावे और ननों के साथ ‘दूसरे दर्जे के नागरिक’ की तरह व्यवहार का, ये महिलाएं विरोध करने से पीछे नहीं हट रहीं। इनका विरोध लगातार जारी है।

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