October 24, 2021 10:38 am
धर्म

जानिए विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त और उनसे जुड़ी कथा के बारे में

Vishwakarma जानिए विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त और उनसे जुड़ी कथा के बारे में

17 सितंबर को भगवान विश्‍वकर्मा की जयंती है। आपको बता दें कि हर साल कन्‍या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा होती है। कहते हैं कि इसी दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था।

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क्या आप जानते हैं कि भगवान विश्वकर्मा का जिक्र 12 आदित्यों और लोकपालों के साथ ऋग्वेद में किया गया है। इसके अलावा पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान विश्वकर्मा को निर्माण और सृजन का देवता माना जाता है। औजारों, मशीनों, कारखानों, फैक्ट्री की पूजा की जाती है। ऐसा करने से जीवन में सुख समृद्धि का वास होता है और आपका व्यापार अच्छा चलता है। चलिये जान लेते हैं कि विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त, और उनसे जुड़ी कथा के बारे में ।

विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त- 17 सितंबर, शुक्रवार को सुबह 6:07 बजे से 18 सितंबर, शनिवार को 3:36 बजे तक पूजन। राहुकाल  काल का समय    –  सुबह 10:30 बजे से दोपहर 12 बजे तक।

पूजा की विधि- इस दिन सूर्य निकलने से पहले आप नहा लें , और रोजाना प्रयोग में आने वाली मशीनों को साफ करें। इसके बाद पूजा करने बैठे। पूजा में भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान विश्वकर्मा की भी फोटो रखें। फिर कुमकुम, अक्षत, अबीर, गुलाल, हल्दी, व फूल, फल, मेवे, मिठाई आदि का भोग लगायें। इसके बाद आटे की रंगोली बनायें और उनके ऊपर सात तरह के अनाज रखें। पूजा में एक जल का एक कलश भी रखें। सी के साथ धूप दीप के बाद आरती करें।

पूजा की कथा- पौराणिक कथाओं के मुताबिक  जब सृष्टि शुरुआत में थी तब भगवान विष्णु प्रकट हुए थे। वो क्षीर सागर में शेषशय्या पर थे। विष्णु जी की नाभि से कमल निकला था। इसी कमल से ब्रह्मा जी जिनके चार मुख थे, प्रकट हुए थे। ब्रह्मा जी के पुत्र का नाम वास्तुदेव था। वास्तुदेव, धर्म की वस्तु नामक स्त्री के  सातवें पुत्र थे। इनकी पत्नी का नाम अंगिरसी था। इन्हीं से वास्तुदेव का पुत्र हुआ जिनका नाम ऋषि विश्वकर्मा था। कहा दाता है कि अपने पिता वास्तुदेव की तरह ही ऋषि विश्वकर्मा भी वास्तुकला के आचार्य बनें।

भगवान विश्वकर्मा अपने पिता की तरह ही वास्तुकला के महान विद्वान बने। कहते हैं भगवान विश्वकर्मा ने ही विष्णु जी का सुदर्शन चक्र, शिव जी का त्रिशूल, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी, पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी, पुष्पक विमान, इंद्र का व्रज, सोने की लंका बनाई थी। लंका में सोने के महतल का निर्माण शिव जी के लिए भी इन्होंने ही किया था। ऐसा कहा जाता है कि महल की पूजा के दौरान रावण ने इसे दक्षिणा के रूप में ले लिया था।

 

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