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अपोलोमेडिक्स: लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट से बचाई जान

WhatsApp Image 2021 09 08 at 4.54.59 PM अपोलोमेडिक्स: लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट से बचाई जान

लखनऊ। अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में दूसरी बार लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट सर्जरी हुई है। 45 साल के लिवर के मरीज का ट्रांसप्लांट कर जान बचाई गई है। मरीज को उनके बेटे ने लिवर डोनेट किया है।

लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट सर्जरी के बारे में डॉ आशीष कुमार मिश्रा ने बताया कि 45 साल के विकट सिंह बेहद गंभीर स्थिति में अपोलोमेडिक्स में लाए गए थे। उनका लिवर लगभग पूरी तरह खराब हो चुका था। इसका असर उनके दिमाग, फेफड़े और किडनी पर भी पड़ने लगा था। उन्होंने बताया कि इस स्थिति को एन्सेफ्लोपैथी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि ऐसी कंडीशन में लिवर ट्रांसप्लांट के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

परिस्थितियों को बताने के बाद उनके बेटे ने लिवर डोनेट करने का फैसला लिया। जिसके बाद हमने उनके बेटे के लिवर से 60 से 65 हिस्से का लोब लिया। मरीज की ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया करीब 17 घंटे तक चली थी। वहीं डोनर की सर्जरी करीब 7 घंटे तक चली। डॉ मिश्रा ने बताया कि ट्रांसप्लांट के बाद मरीज और डोनर दोनों को निगरानी में रखा गया था। उनकी स्थिति अब सामान्य है।

डॉ आशीष ने बताया कि शराब का ज्यादा सेवन करने, डायबिटीज और मोटापे की वजह से लिवर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। स्थिति यह है कि स्वस्थ लिविंग डोनर भी मिलने में परेशानियां आती हैं। उन्होंने बताया कि हर साल करीब 40 से 50 हजार लिवर मरीजों को ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। लेकिन स्वस्थ लिविंग डोनर या कैडेवर नहीं मिलने के के कारण सिर्फ 10 फीसदी मरीजों का ही ट्रांसप्लांट संभव हो पाता है। उन्होंने बताया कि ये आंकड़े तो अस्पतालों में दर्ज होने वाले हैं, ग्रामीण इलाकों में कई ऐसे मामले हैं जो दर्ज ही नहीं होते हैं।

दो तरह के होते हैं ट्रांसप्लांट

अपोलोमेडिक्स के ही डॉ सुहाग वर्मा ने बताया कि लिवर का ट्रांसप्लांट दो तरीकों से किया जाता है। जिसमें एक कैडेबर लिवर ट्रांसप्लांट यानि कि किसी मृत व्यक्ति का लिवर मरीज को लगाया जाता है। दूसरा लिविंग होता है। इसमें जीवित व्यक्ति के लिवर का एक लगभग एक तिहाई हिस्सा निकालकर मरीज को लगाया जाता है। डोनर का लिवर कुछ महीनों में ही अपने वास्तविक आकार में आ जाता है। डोनर के शरीर पर इसका कोई नकारात्मक असर भी नहीं पड़ता है।

लिवर सिरोसिस सबसे बड़ा कारण

डॉ वलीउल्लाह ने बताया कि लिवर सिरोसिस के कारण सबसे ज्यादा ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। लिवर सिरोसिस गलत खानपान या गंभीर बीमारियों की वजह से हो सकता है। उन्होंने बताया कि लिवर डोनर को लेकर कई प्रकार के डर समाज में होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि डोनर को किसी भी प्रकार कोई समस्या नहीं होती है। मात्र एक से डेढ़ महीने में ही उनका लिवर पहले की तरह दोबारा विकसित हो जाता है।

सीईओ ने जताई खुशी

अपोलोमेडिक्स के सीईओ और एमडी डॉ मयंक सोमानी ने बताया कि यह गर्व का विषय है कि हम लगातार मरीजों के हित में बेहतरीन सेवाएं दे रहे हैं। एक ही छत के नीचे हम मरीजों को अल्ट्रा मॉडर्न मेडिकल टेक्नोलॉजी से लैस सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं। उन्होंने ट्रांसप्लांट करने वाली टीम को बधाई दी।

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