सेंसर बोर्ड की सख्त नजरों से नहीं बच पाई थी शोले…..

सेंसर बोर्ड की सख्त नजरों से नहीं बच पाई थी शोले…..

नई दिल्ली। आज जब फिल्मों को लेकर सेंसर बोर्ड पर सवाल उठाए जाते हैं तो याद आती हैं वो फिल्में जो सेंसर बोर्ड के कहर से बच नहीं पाई थीं।इस लिस्ट में शामिल है बॉलीवुड की लेजेंडरी फिल्म शोले। निर्देशक रमेश सिप्पी ने 1975 में आई फिल्म शोले के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया।

 

रमेश सिप्पी ने बताया कि उन्होंने शोले का अंत अलग तरह से शूट किया था। उस सीन में ठाकुर (संजीव कुमार ) गब्बर सिंह ( अमज़द खान) को कील लगे अपने जूते से कुचल कर मार देता है। ‘तेरे लिए तो मेरे पैर ही काफ़ी हैं’ डायलॉग आज भी इसी कारण फेमस है, लेकिन सेंसर बोर्ड ने इस पर सख़्त ऐतराज़ किया था।

सेंसर ने उसे पास किया। रमेश सिप्पी कहते हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि वो क्या करें। ठाकुर मारे भी तो कैसे? पिस्तौल या बंदूक से तो मार नहीं सकता। उसके तो हाथ ही नहीं थे। सेंसर को फिल्म में इतनी ज़्यादा हिंसा भी पसंद नहीं थी।

इस फिल्म के डॉयलाग आज भी लोगों को मुंहजबानी याद है।हर एक किरदार चाहे वो बंसती का किरदार हो, या मौसी का, चाचा का या सांभा का। किरदार चाहे छोटे या बड़े रहे हों या फिर उनके संवाद।हर किरदार अपने आप में एक मास्टरपीस था।इस फिल्म को भी सेंसर बोर्ड ने अपनी सख्त नजरों से बचकर नहीं जाने दिया था।