January 29, 2022 7:38 am
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अपनों की चाहत से बुजुर्गों को अकेलेपन से मिली राहत

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  • परिवार और बच्‍चों के साथ हंस-बोलकर समय काट रहे बुजुर्ग

लखनऊ। पहले देशव्‍यापी लॉकडाउन और फिर प्रदेश में भयावाह कोविड की लहर को देखकर भले लोग अपने घरों तक सीमित रह गए है। लेकिन उनके समाने तमाम चुनौतियां खडी हैं। तो वहीं खुद को अकेला महसूस करने वाले आज उन तमाम बुजुर्गो के चेहरों पर मुस्‍कान झलकने लगी है। वह बुजुर्ग जो अपने बेटों और बहु के ऑफिस पर जाने व बच्‍चों के स्‍कूल में रहने से अकेलापन महसूस करते थे। बीते एक साल वह अपने एकाकीपन से दूर राहत की सांस रे रहे हैं।

खासतौर पर इनदिनों घर बुजुर्गो का ज्‍यादा समय बच्‍चों के साथ हंस बोलकर व ताश कैरम, शतरंज, लूडो आदि खेलकर मौजमस्‍ती के साथ बीत रहा है। दरअसल, देश में सालभर पहले कोविड की दस्‍तक पर पीएम ने देशव्‍यापी लॉकडाउन का ऐलान कर देशवासियों से घर में रहने व सोशल डिस्‍टेंसिंग को पालन करने की अपील की थी। आवश्यक काम से ही लोग अपने घरों से बाहर जाएं। हालांकि, देशव्‍यापी लॉकडाउन के बाद यूपी में दोबारा लगे लॉकडाउन से बुजुर्गो को अकेलेपन की सजा और घुटन से निजात मिली है।

बच्‍चों के साथ मौजमस्‍ती कर बिता रहे समय

आलमबाग के रहने वाले बाबूराम डाक विभाग से सेवानिवृत्त है। उनके चार बेटे और पुत्रवधु नौकरी करती है। जिस वजह से वह घर पर अकेले रहते थे। उनका कहना है कि एक साल से हम सभी परिवार के लोग एक ही छत के नीचे खेलकूद व एक दूसरे से बातचीतकर समय व्यतीत कर रहे हैं। बच्चों की शरारतों का आनंद लेना जीवन का सबसे बड़ा सुखद अनुभव है। इनकी धमाचौकड़ी और बेटों के साथ गुजर रहा हर लम्हा उन्हें अकेलेपन से बचा रहा है। परिवार के साथ बीते समय में एक साल कैसे कम हुआ यह पता ही नहीं चला।

काफी समय बाद मिला मानस‍िक सुख

गढ़ी कनौरा के रहने वाले भारत सिंह का कहना है कि पांच साल पहले वह रेलवे विभाग से रिटायर्ड हो चुके थे। बताया कि बेटा और बहु सर्विस करते हैं। बच्चों की गैर मौजूदगी में अपना समय काटने के लिए आस-पडोस के लोगों से साथ बातचीत करते थे। इसके बावजूद घर में बच्चों की कमी हमेशा खलती थी। कहते है कि एक साल से उनका पूरा समय परिवार के साथ व्‍यतीत होता है। बच्चों के साथ रहने बोलने और लूडो खेलने से अब घुटन का एहसास नहीं होता है। साथ ही मानसिक सुख-शांति मिल रही है ।

पता ही नहीं चला साल कैसे बीता

राजाजीपुरम की रहने वाली निरूपमा सिंह का कहना है कि कामकाज के चलते बच्चे हमेशा व्यस्त रहते थे। अब एक साल से बच्चों के साथ दिनभर रहने का मौका मिला। एक ओर सरकार ने लाॅकडाउन में घरों कैद रहकर कोरोना पर जीत हासिल करने के लिए कहा वह एक प्रंशसनीय कदम है। बच्चों के साथ रहना सुखद अनुभव है। बताया कि बच्चों के साथ हंस बोलने से समय का पता ही नही लगा क‍ि एक साल कैसे गुजर गया।

बेचैनी से मिली राहत

कृष्णानगर की रहने वाली द्रौपदी ने बताया कि जिम्मेदारियों को निभाते हुए पता नही नहीं चला कि समय कितना बीत चुका है। बच्चे कब बड़े हो गए और वो भी सर्विस करने लगे। बताया कि पहले बच्चों के बिना घर अच्छा नहीं लगता था। एक लम्‍बे असरे बाद परिवार के साथ रहने का मौका मिला है। ऐसा लगाता है जैसे कि शरीर में शरीर की बीमारी गायब हो गई। पहले दवा न लेने से बेचैनी लगती थी। लेकिन अब बच्चों के साथ कैमर, लूडों खेलना दिनचर्या बन चुकी है।

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