September 25, 2023 12:05 pm
राजस्थान

हजूरी समाज की परंपरागत होली की गैर का आयोजन, श्रद्धालुओं से खचाखच भरा परिसर

Screenshot 1471 हजूरी समाज की परंपरागत होली की गैर का आयोजन, श्रद्धालुओं से खचाखच भरा परिसर

नरेश कुमार सोनी, संवाददाता

स्वर्णनगरी जैसलमेर में होल्काष्टक से ही होली की धूम शुरु हो गई है । आज हुजूरी समाज गैर का आयोजन किया गया।

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जिसमें सोनार दुर्ग स्थित नगर अराध्य लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर में भगवान के साथ जनसमूह ने मंदिर में होली खेली फाग के दौरान मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था । जिसके बाद हुजूरी समाज द्वारा धड़ों की पारंपरिक गैर निकली जैसलमेर में होली को लेकर वर्षों से यह परपंरा चल रही है कि होल्काष्टमी से लक्ष्मीनाथजी मंदिर में फाग का आयोजन शुरू हो जाता हैं।

Screenshot 1470 हजूरी समाज की परंपरागत होली की गैर का आयोजन, श्रद्धालुओं से खचाखच भरा परिसर

इस दौरान विभिन्न फाग के गीतों द्वारा तबले व चंग के साथ समा बांधा गया जिसमे बड़ी संख्या में होली के रसिया बुजुर्ग, युवा और बच्चे फागोत्सव में हिस्सा लेने पहुंचे। फाग के दौरान मंदिर परिसर खचाखच भरा हुआ था। माना जाता है कि फाग के दौरान खुद भगवान लक्ष्मीनाथ जी श्रद्धालुओं के साथ फाग खेलते हैं गैर आरंभ होने से पूर्व समाज के लोगों ने लक्ष्मीनाथ मंदिर पहुंचकर पूजा की और गुलाल उड़ाकर होली का आनद लिया ।

Screenshot 1471 हजूरी समाज की परंपरागत होली की गैर का आयोजन, श्रद्धालुओं से खचाखच भरा परिसर

जैसलमेर मे होली पर्व से पूर्व फाग खेलने के बाद यहां के पुष्करणा ब्राह्मणों और हुजूरी समाज की गेरें निकलनी शुरू हो जाती है। गेरें सोनार किले से रवाना होकर मुख्य बाजार होते हुए गांधी चैक में गणेश जी के मंदिर के आगे समाप्त की जाती हैं। जब ये गेरें अपने भाई-बंधुओ के मोहल्लों से बाहर निकल आती है। तो गेरिए होली के रंग में रंगे नजर आते है और होली के गीतों को गाकर पर्व की खुशी का इजहार करते हैं बाजार में गैर को देखने के लिए भीड़ उमड़ जाती है। मरूप्रदेश के लोक जीवन में भिन्न भिन्न पर्वो, त्योहारों और मेले मगरियों में गीतों का महत्व है। ठीक उसी तरह होली के पर्व पर भी यहां के लोग अपने कठोर जीवन को सरल बनाकर फाग आदि गीत गाए गाये जा रहे हैं।

Screenshot 1472 हजूरी समाज की परंपरागत होली की गैर का आयोजन, श्रद्धालुओं से खचाखच भरा परिसर
हुजूरी समाज की गैर के दौरान एक छोटे बालक गोपाल सिंह जंगा ने चंग पर फाग गाकर अपने दादाजी और अपने पिता की फाग गाने की परंपरा को जीवंत कर दिया और उपस्थित समाज के लोगों का मन मोह लिया बालक गोपालसिंह ने बताया कि मेरे दादाजी द्वारा गायी गई फाग आज भी लोग बड़े चाव से सुनते हैं।

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