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किसकी चुनावी नैया को पार करेंगे ब्राह्मण वोटर ?

up dangal किसकी चुनावी नैया को पार करेंगे ब्राह्मण वोटर ?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश का चुनावी रण सज चुका है। दम और ललकार के साथ हर दल चुनावी दंगल में ताल ठोंक रहा है। गणित एक है बस सत्ता की चाह जिसको लेकर हर पार्टियां अपने दमखम को आजमाने पर लगी हैं। सूबे में पार्टियों के परम्परागत वोटरों के अलावा कुछ ऐसे जातीय समीकरण है जो चुनावी दंगल में लिए खास हैं।

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ऐसा ही एक समीकरण है ब्राह्मणों के वोटों का सूबे में वोटरों की पहली पंक्ति इन्हीं वोटरों की आती है। माना जाता है सूबे में कुल आबादी का 10 प्रतिशत ब्राह्मण हैं । लेकिन इनके प्रभाव में तकरीबन 30 फीसदी तकबा रहता है। ये वो छिपे वोटर हैं जो किसी भी राजनीतिक दल की गणित को बना और बिगाड़ सकते हैं।

क्या गणित है ब्राह्मण वोटरों की
सूबे की सियासत हमेशा से जातीय समीकरणों के इर्दगिर्द घूमती नजर आती रही है। 2007 में जातीय गणित की नब्ज भांफ कर मायावती ने सूबे का चुनावी रण जीता था। इसके बाद अखिलेश ने इसी नब्ज को पकड़ कर 2012 पर का चुनावी दंगल जीता था। इस बार फिर चुनावी अखाड़े में सभी सूरमा खड़े हैं। अपने-अपने दांव आजमाने की कोशिश भी कर रहें हैं। हर सूरमा एक नये दंगल को जीतने और खेलने में लगा है। लेकिन सूबे में इस दगंल में सबसे अहम दांव हैष ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में साधने ने सूबे में अलग-थलन पड़े ब्राह्मण वोटरों पर पहली नजर बसपा की बहन मायानाती की साल 2007 के आम चुनाव के पहले पड़ी थी। माया ने ब्राह्मण भाई चारा का मंत्र फूंक कर 2007 के रण में विरोधियों को मात दे दी थी। ब्राह्मणों का चुनावी गणित भले ही संख्या में कम दिखे क्यूं कि इनका प्रतिशत कुल आबादी का केवल 10 फीसदी ही है लेकिन इनता भी चुनावी गणित में बड़ा स्थान रखता है, अगर इनको साध लिया जाये तो ये किसी भी सीट पर 30 से 25 फीसदी वोटों को प्रभावित कर देते हैं।

क्या भूमिका है चुनाव में इन वोटरों की
यूपी की सियासत में कभी सियासी गलियारों में ब्राह्मणों का दबदबा बोलता था। लेकिन जैसे-जैसे सियासत दलितों और पिछड़ी जाति के साथ मुस्लिम वर्ग की ओर झुकने लगी । ब्राह्मणों का कद और दबदबा सियासी गलियारों में कम होने लगा। वक्त के साथ ये अलग-थलग होने लेगे। फिर जब वोटों के बंटबारे के बाद पार्टियों ने अपने समीकरणों का विश्लेषण किया तो साफतौर पर केवल ब्राह्मण वर्ग ऐसा नजर आया जो किसी भी दल का एक छत्र कैडर नहीं था। लेकिन इसकी क्षमता कई सीटों के प्रभावित करने में सक्षम थी। आखिरकार ब्राह्मण वोटों पर पहला दांव बसपा ने खेले और 2007 के विधान सभा चुनाव में बसपा ने जीत दर्ज कर ये साफ कर दिया ब्राह्मण वोटरों का साथ एक बड़ी भूमिका सूबे की राजनीति में रखता है। ये किसी भी दल के लिए चुनावी हवा बांधने के साथ अपने द्वारा प्रभावित लोगों को वोटों में बदलने की क्षमता रखते हैं। जिससे ये सूबे की आबादी का10 फीसदी होते हुए कई सीटों पर बड़े कारगार प्रभाव रखते हैं।

चुनावी रंगत बदलने की कैसे है क्षमता
ब्राह्मण वोटरों को एक बार फिर साधने की कवायत हो रही है। क्योंकि इनके साथ के साथ इनकी वोटरों पर मजबूत पकड़ किसी भी पार्टी को एक बड़ी मजबूती प्रधान कर सकती है। हांलाकि अगर सूबे में कुल इनके प्रतिशत की बात करें तो ये महज 10 फीसदी हैं। लेकिन इनका प्रभाव अगड़ी जातियों से लेकर पिछड़ी और दलित वर्गों पर भी ज्यादातर देखा गया है। अपने इसी प्रभाव के चलते यह वर्ग समाज में एक विशेष स्थान रखता है। इसी कारण अपने प्रभाव के चलते ये सूबे के 30 से 25 फीसदी वोटरों को प्रभावित कर देते हैं। अगर ये बड़ी संख्या में एक पाले में आ गिरें तो सूबे में 30 से 40 सीटों पर सीधा प्रभाव डाल सकते हैं। यही वजह है कि ब्राह्मण वोटरों को साधने के फिराक में अब हर दल आगे आने लगे हैं।

अब तक किस-किस पाले में रहे हैं ब्राह्मण वोटर
ब्राह्मण वोटरों की बड़ी खेप कांग्रेस के पाले में सूबे में हमेशा से रही है। लेकिन भाजपा के उदय के बाद इनमें बंटवारा हो गया । धीरे-धीरे ये वर्ग राजनीति से उपेक्षित होता गया। इसके बाद इस वर्ग को बिखराव अन्य दलों में भी बड़े पैमाने पर होता चला गया। लेकिन बसपा ने 2007 में इन ब्राह्मणों को साधने के साथ एक जुट होने के लिए संगठित किया । जिसका परिणाम था कि 2007 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में सिर्फ 17 फ़ीसदी ब्राह्मणों ने ही मायावती को वोट दिया। 2007 में ब्राह्मण तकबा माया के साथ रहा तो 2009 के लोकसभा के आम चुनाव में कांग्रेस के पाले में जा गिरा। इसके बाद 2012 के विधान सभा चुनाव में माया के रूख से नाराज ब्राह्मणों को अखिलेश ने थाम लिया और सत्ता की राह पकड़ी। हांलाकि 2014 की मोदी लहर में पहली बार सूबे में किसी समीकरण को कोई हवा नहीं मिली। लेकिन इस बार हालत अब 2014 जैसे नहीं है। इसलिए इस वर्ग को साधने के साथ ही गणित को साधा माना जा सकता है।

इस बार के चुनावी दंगल में हर दल हर वर्ग को जानने-समझने में लगा है। अपने अपने तरीकों से सूबे के समीकरण को साधने में जुटा है। लेकिन कुछ ऐसे छिपे समीकरण है जिनकी हवा जिधर बहती है सत्ता का रूख उधर हो जाता है। ऐसे ही बिखरे वोटरों के समीकरणों में ब्राह्मण वर्ग है। जिसको साधकर कई बार कई दलों ने सत्ता का गणित हल किया है। अब इस बार कौन ये गणित लगायेगा किसके भाग्य में ये मंत्र समझ में आयेगा सब कुछ 11 मार्च को समाने आ ही जायेगा।

Piyush Shukla किसकी चुनावी नैया को पार करेंगे ब्राह्मण वोटर ?अजस्र पीयूष

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