आ रही कामदा एकादशी ऐसे करे पूजन-मिलेगा लाभ

नई दिल्ली। चैत्र महिना हिंदू कैलेंडर के अनुसार पहला महिना कहलाता हैं औऱ इस की शुरूआत मां के पावन नौ दिनों के साथ होती हैं कहते है ंमां साल की शुरूआत इससे अच्छी होती हैं। चैत्र शुक्ल एकादशी को कामदा एकादशी का व्रत करने का विधान है। इस वर्ष 27 मार्च को ये पर्व मनाया जायेगा। जाने कैसे होती है इस दिन पूजा।

प्रेत से मिलती है मुक्‍ति

कामदा एकादशी हर साल चैत्र के महिने में होती हैं और इस बार की कामदा एकादशी 27 मार्च 2018 को पड़ रही हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कामदा एकादशी का व्रत रखने से प्रेत योनि से भी मुक्ति मिल सकती है। वैसे तो पत्‍येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में आने वाली दोनों एकादशियों का अपना विशेष महत्व होता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी कामदा एकादशी कहलाती है।इसका महत्‍व इसलिए भी काफी होता है क्‍योंकि यह हिंदू संवत्सर की पहली एकादशी होती है। ऐसा माना जाता है कि यह बहुत ही फलदायी होती है इसलिये इसे फलदा एकादशी भी कहते हैं।

पूजा विधि और मुहूर्त

कामदा एकादशी की पूजा की शुरूआत सबसे पहले आपको स्नान से करना चाहिए।  व्रत का संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा के लिए भगवान विष्णु को फल, फूल, दूध, तिल और पंचामृत आदि सामग्री अपर्ण करें। पूजा के बाद इस दिन एकादशी व्रत की कथा सुनने का भी विशेष महत्व होता है। कामदा एकादशी के व्रत और पूजन के बाद द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोज और दक्षिणा दे कर इस व्रत का पारन करना चाहिए। इन सबका मुहूर्त इस प्रकार है। कामदा एकादशी की तिथि प्रारंभ 27 मार्च की सुबह 03:43 बजे से होगा और अगले दिन 28 मार्च की रात्रि 01:31 पर तिथि समाप्‍त होगी। इसके बाद पारण का मुहूर्त 28 मार्च को प्रात: 06:59 से लेकर सुबह 08:46 बजे तक होगा।

व्रत कथा

बताते हैं एक बार धर्मराज युद्धिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से चैत्र शुक्ल एकादशी का महत्व,  व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की। तब भगवान ने सारी विवेचना के साथ उन्‍हें ये कथा सुनाई। कहते हैं रत्नपुर नाम का एक नगर था जिसमें पुण्डरिक नामक राजा राज्य किया करते थे। यहां पर ललित और ललिता नामक गंधर्व पति पत्नी भी रहते थे। ललित और ललिता एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे।, एक दिन राजा पुण्डरिक की सभा में नृत्य का आयोजन चल रहा था जिसमें गंधर्व ललित भी गा रहा था। अचानक उसे अपनी पत्नी ललिता की याद आयी और उसका थोड़ा सा सुर से बिगड़ गया। कर्कोट नाम के नाग ने उसकी इस गलती को भांप लिया और उसके मन में झांक कर इस गलती का कारण जान राजा पुण्डरिक को बता दिया। पुण्डरिक यह जानकर बहुत क्रोधित हुए और ललित को श्राप देकर एक विशालकाय राक्षस बना दिया।

अपने पति की इस हालत को देखकर ललिता को बहुत दुख हुआ। वह उसे इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने का मार्ग खोजने लगी। इसी प्रयास में एक दिन वह श्रृंगी ऋषि के आश्रम में जा पंहुची और ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने ललिता से पूछा कि इस बियाबान जंगल में तुम क्या कर रही हो और यहां किसलिये आयी हो। तब ललिता ने अपना सारा कष्‍ट महर्षि को बताया। इस पर ऋषि ने कहा कि चैत्र शुक्ल एकादशी तिथि आने वाली है। इस व्रत को कामदा एकादशी कहा जाता है तुम इसका विधिपूर्वक पालन करके अपने पति को उसका पुण्य देना, तब उसे राक्षसी जीवन से मुक्ति मिल सकती है। ललिता ने वैसा ही किया, व्रत का पुण्य मिलते ही ललित राक्षस से पुन: अपने सामान्य रूप में लौट आया, और दोनो को समस्‍त सुख भागने बाद स्‍वर्ग की प्राप्‍ति हुई। तो इस पूजा को बतां गए विधी विधान से अगर आप करेगें तो आप देखेगें कि इसका प्रभाव काफी अच्छा फड़ता हैं।