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राधा अष्टमी: प्यार करने के बाद भी कृष्ण ने नहीं की राधा से शादी, आज भी दोनों का एक साथ लिया जाता है नाम

radha krishan 2 राधा अष्टमी: प्यार करने के बाद भी कृष्ण ने नहीं की राधा से शादी, आज भी दोनों का एक साथ लिया जाता है नाम

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण की प्रिय राधा जी का जन्म हुआ था। इसलिए यह दिन राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। आज वो दिन है। आज के दिन राधा कृष्ण की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है।

यहां हुआ था राधा जी का जन्म

राधा जी का जन्म उत्तरप्रदेश में मथुरा के पास बरसाना गांव में हुआ था। वहां बड़े पैमाने पर राधा अष्टमी पर उत्सव मनाया जाता है। स्कंद पुराण के विष्णु खंड के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की 16 हजार रानियां थीं । लेकिन उन सबसे ज्यादा उन्हें राधा प्रिय थीं।

पूजा का सही समय

हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी की तिथि को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि सोमवार को दोपहर 3 बजकर 10 मिनट पर शुरू होगी और मंगलवार को दोपहर 1 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगी। मान्यता के अनुसार राधा अष्टमी व्रत के बिना कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का फल नहीं मिलता है। इसलिए कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले लोग राधा अष्टमी का व्रत जरूर रखते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी की तरह राधा अष्टमी की व्रत भी राधा के जन्मदिन पर मनाया जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण के साथ जुड़ा है राधा का नाम

मौजूदा समय में भगवान कृष्ण और राधा रानी के कई मंदिर मिल जाएंगे। मथुरा के वृंदावन में राधा रानी का भव्य मंदिर है। भगवान कृष्ण के नाम के साथ हमेशा राधा का ही नाम जोड़ा जाता है। लेकिन अभी भी सबके मन में यह सवाल यह उठता है कि जब श्रीकृष्ण के जीवन में राधा इतनी महत्वपूर्ण थीं तो उन्होंने राधा से विवाह क्यों नहीं किया?

यहां हुआ था राधा का जन्म और विवाह

पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा, कृष्ण की मित्र थीं और उनका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। कुछ विद्वान मानते हैं कि राधा रानी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए थे। लेकिन ज्यादातर जानकार मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को ‘लाडली’ कहा जाता है।

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ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार राधा, श्रीकृष्ण की मामी थीं क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के 5वें अध्याय में श्लोक 25, 26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है।

राधा को माना गया माता लक्ष्मी का रूप

राधा के पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप थे। अतरू गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुईं। माना जाता है कि गोकुल में रायाण रहते थे। मतलब यह कि राधा का श्रीकृष्ण से पिछले जन्म का भी रिश्ता है। यहां भी उन्हें माता लक्ष्मी का रूप माना जाता है।

राधा को मिला था शाप

राधा को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणी से भगवान कृष्ण की शादी हुई। राधा और रुक्मणी यूं तो दो हैं। परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी की ही अंश हैं। माना जाता है कि मध्यकाल या भक्तिकाल के कवियों ने राधा-कृष्ण के वृंदावन के प्रसंग का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत भी मध्यकाल में हुई। उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी। दक्षिण के आचार्य निम्बार्क जी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि जयदेव ने पहली बार राधा का जिक्र किया था और उसके बाद से श्रीकृष्ण के साथ राधा का नाम जुड़ा हुआ है। इससे पहले राधा नाम का कोई जिक्र नहीं था।

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