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कुमाऊं में खुशहाली, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य, धनधान्य और हरियाली का प्रतीक हरेला पर्व आज घर-घर हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
जगह-जगह लगाए जातें है पौधे 
हरेला पर्व आज बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस दिन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से जगह-जगह पौधारोपण किए जाते हैं। इस दौरान सभी लोग पौधा रोपण कर धरा को हरा – भरा रखने का संदेश देते हैं।
उत्तराखंड का प्रमुख लोक पर्व है हरेला
हरेला की पूर्व संध्या पर कई लोग अपास में मिल कर विचार विमर्ष करते हैं कि कहां – कहां जगह पौधे लगाएं जाएं । इसके लिए जगह चुनी जाती है। गौरतलब है कि हरेला उत्तराखंड का प्रमुख लोक पर्व है। जिसमें प्रकृति के प्रति अपने प्रेम व लगाव को दर्शाया जाता है।
सावन मास हुआ शुरू 
हरेला पर्व के साथ ही सावन मास शुरू हो जाता है। पर्व से नौ दिन पूर्व घर में स्थापित मंदिर में पांच या सात प्रकार के अनाज को मिलाकर एक टोकरी में बोया जाता है। हरेले के तिनके अगर टोकरी में भरभराकर उगें तो माना जाता है कि इस बार फसल अच्छी होगी। हरेला काटने से पहले कई तरह के पकवान बनाए जाते है। पकवान बनने के बाद देवी देवताओं को भोग लगाने के बाद पूजा की जाती है।
चंदन से किया जाता है पूजन
हरेला का अर्थ हरियाली से है। हरेला के दिन इसे काटने के बाद तिलक, चंदन, अक्षत लगाया जाता है। घर के सभी बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे इसे शिरोधारण करते हैं। इस मौके पर सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य की कामना की जाती है। यह प्रकृति पूजन का प्रतीक भी है। यहां लोग पीपल, वट, आम, हरड़, आंवला आदि के पौधों का किसी न किसी रूप में पूजन करते हैं जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं।

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