राम मंदिर पर भाजपा से ज्यादा कांग्रेस ने किया है कई बार सपोर्ट जाने कैसे और कब

राम मंदिर पर भाजपा से ज्यादा कांग्रेस ने किया है कई बार सपोर्ट जाने कैसे और कब

नई दिल्ली। राम मंदिर को लेकर अब भाजपा जहां एक तरफ अपने परम्परागत वोटरों से जलालत झेल रही है। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नववर्ष की संध्या पर दिए एक निजी न्यूज एजेन्सी को इन्टव्यू में इस मुद्दे पर दो टूक जबाव देते हुए साफ किया। उनका कहना था कि राममंदिर पर भाजपा और वर्तमान सरकार कोई अध्यादेश नहीं लाएगी। इस मुद्दे का हल संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगा। इस बयान से जहां भाजपा के वैचारिक संगठनों संघ और विहिप को धक्का लगा है। वहीं आम जन मानस जिसने मंदिर और राम पर भाजपा को वोट किया था ।

अयोध्या से इस मुद्दे पर संतो की तीखी प्रतिक्रिया भी आई है। रामजन्मभूमि के मुख्य अर्चक आचार्य सतेन्द्र दास ने मानस की चौपाई का सहारा लेते हुए कहा कि मोह कपट छल छिद्र ना भावा तो भगवान को ऐसे लोगो पसंद नहीं आते इस बात का जबाव 2019 में भाजपा को मिलेगा। वहीं रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास ने भी भाजपा को नसीहत देते हुए कहा है कि राम मंदिर के बिना भाजपा का कल्याण संभव नहीं। इसके साथ ही विहिप के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी इस बारे में भाजपा से बातचीत करने की बात कही है।

इसके पहले संघ प्रमुख ने भाजपा को इस मामले में अध्यादेश लाने के लिए मंच से कहा था। इसके बाद राजनीति के गलियारों में राम जन्मभूमि विवाद पर अध्यादेश की बात हो रही थी। लेकिन अब भाजपा के बैकफुट पर जाने के बाद भाजपा की राम को लेकर दी जाने वाली दलीलों पर सवालिया निशान लग गया है। ऐसे में 1989 में रामजन्मभूमि के मुद्दे से दूर जा चुकी कांग्रेस भी भाजपा पर निशाना साधते हुए । इस मुद्दे पर भाजपा से नाराज वोटरों के घावों पर मरहम लगाने का काम करने में लगी हुई है।

वैसे देखा जाए तो रामजन्मभूमि विवाद में कांग्रेस की भूमिका अहम रही है। अगर मंदिर का ताला खुला तो कांग्रेस की अहम भूमिका थी उस वक्त केन्द्र सरकार के दिशा निर्देश में ये सब कुछ हुआ था। यहां तक की राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास भी कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सानिध्य में हुआ था। लेकिन इसके बाद इस मुद्दे को भाजपा और संघ के साथ इनके वैचारिक संगठन विहिप ने अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद इस मुद्दे पर भाजपा ने जमकर हिन्दु भावनाओं के साथ खेला है।

2 सीटों से 283 तक का सफर तय किया है। लेकिन राम के नाम पर वोट लिया अब जब बात राम मंदिर की होती है भाजपा बैकफुट पर आ गई है। अगर तारीखों पर गौर करें तो 1992 में विवादित परिसर का ढांचा गिरा तब भी देश में कांग्रेस की सरकार थी। तत्कालीन सरकार ने कहा था कि अगर वहां राम मंदिर के सबूत मिले तो वहां पर कांग्रेस राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में रहेगी। यहां तक कि इस मामले को खत्म करने के लिए कांग्रेस लोकसभा में विधेयक लाने वाली थी। लेकिन इस मसौदे का भाजपा ने भी विरोध किया था। अब भाजपा सत्ता में है लेकिन राम लला आज भी टेंट में अपने मंदिर की राह देख रहे हैं।

अजस्र पीयूष