कांग्रेस को साथ लेने का अब कौन उठाएगा रिस्क?

यूपी में हुए चुनाव ने जहां एक तरफ भाजपा के 14 वर्षों के वनवास को समाप्त किया वहीं राहुल गांधी के राजनीतिक शक्ति पर एकबार फिर से सवालिया निशान लगा दिया है। 403 सीटों वाले यूपी विधनसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने गठबंधन कर मोदी के लहर को रोकने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन जनता को अखिलेश-राहुल का यह साथ कतई पसंद नहीं आया, जिसका खामियाजा राज्य में करारी हार से उठाना पड़ा। अपनी चुनावी सभाओं के दौरान अखिलेश बार बार यह कहते रहे कि दोस्ती के लिए दिल बड़ा होना चाहिए, जिस दोस्ती के लिए अखिलेश ने राहुल गांधी को चुनाव लड़ने के लिए 105 सीटें वार दीं उसी दोस्ती ने सपा सरकार की लुटिया डुबाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। 105 सीटों पर खेला गया दांव, अखिलेश के लिए काफी महंगा पड़ा और परिणाम में मिले बस 7 सीट। इस तरह से इस दोस्ती ने सपा को 98 सीटों का नुकसान हुआ।

सपा ने ऐन चुनाव से पहले उस पार्टी से गठबंधन किया, जिसका नेताजी हमेशा से विरोध करते रहे। अखिलेश ने चुनाव जीतने के लिए गठबंधन का रास्ता तो अपनाया लेकिन इसकी खिलाफत नेताजी ने दबे मन से जरुर की, हालांकि कुछ भी बोलने से नेताजी बचते रहे। इसे अखिलेश से नाराजगी ही कहें कि नेताजी ने इस चुनाव में मात्र 3-4 जनसभाएं की। ये चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए बेहद अहम हैं। खास कर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी के लिए। यह मान लेना चाहिए कि समाजवादी पार्टी के लिए इसका कोई खास मतलब नहीं है। चुनाव से पहले ही मुलायम सिंह ने बहुत कायदे से बेटे अखिलेश यादव का नेतृत्व पार्टी में स्थापित कर दिया है। उनको यह भी पता है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में लगातार दूसरी बार सत्ता में आना कितना मुश्किल है। सपा अपने 25 साल के जीवनकाल में यह करिश्मा नहीं कर पाई है। इसी तरह पंजाब में अकाली दल को भी पता है कि लगातार तीसरी बार सत्ता में नहीं आए तो कोई बड़ी आफत नहीं आ रही है। लेकिन अगर कांग्रेस इन चुनावों में नहीं जीती तो उस पर बड़ी आफत आ सकती है। वैसे तो कांग्रेस ने अपनी घटती ताकत को देखते हुए गठबंधन की राजनीति को अपना लिया है। लेकिन उसमें भी उसकी मोलभाव करने की ताकत लगातार कम होती जा रही है।

कांग्रेस के कहें कि दिन खराब चल रहे हैं या फिर पार्टी को बड़ा निर्णय आसानी से ले पाने में लगातार असमर्थ दिख रही है। पांच राज्यों मे हुए चुनाव के बाद मणिपुर और गोवा में कांग्रेस को भाजपा से अधिक सीटें मिली, इसके बावजूद भी कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ रहा है। सिर्फ पंजाब ही एक ऐसा राज्य है जहां के परिणाम घाव पर मरहम का काम कर सकते हैं, यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि पंजाब में कांग्रेस को जो जीत मिली है , उसमें पार्टी के किसी भी बड़े चेहरे का कोई खास योगदान नहीं है, जीत का सारा श्रेय मौजूदा सीएम अमरिंदर सिंह को जाता है। यूपी चुनाव से पहले एक बयार चली थी जिसमें प्रियंका गांधी को प्रदेश में प्रचार का नेतृत्व देने की बात चली, लेकिन पार्टी के आला अधिकारियों ने इसपर कोई खास तवज्जो नहीं दिया, और मुख्य प्रचारक राहुल ही बने रहे, चुनाव से कई महीने पहले राहुल देवरिया से दिल्ली यात्रा पर निकले, ख्ूब खाट चौपाल की, चुनाव के दौरान सपा के युवा चेहरा अखिलेश का साथ भी मिला, पर परिणाम अन्त में 7 सीट।

विशेषज्ञ पहले से ही इस बात पर गहन चर्चा करते रहे कि यह चुनाव राहुल गांधी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होने वाला है, अगर जीतते है तो पार्टी का राहुल पर विश्वास बना रहेगा और यूपी चुनाव की हार राहुल के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा देगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही हार के बाद राहुल मीडिया के सामने तो आए पर गठबंधन के सवालां पर कतराते रहे। कांग्रेस उन राज्यों से भी अपनी सत्ता गंवा चुकी है जिन राज्यों में अब तक कई वर्षो से लगातार कुर्सी पर सवार थी, मणिपुर में कांग्रेस को भाजपा से अधिक सीटें मिली फिर भी सरकार बनाने में असमर्थ रही।

कांग्रेस के गठबंधन से यूपी मे सपा को कोई फायदा तो नहीं नुकसान जरुर उठाना पड़ा, ऐसे अनुमान लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस को दिए 105 सीटों पर अगर सपा चुनाव लड़ रही होती तो इतने सीट तो जरुर ले आती। अब कांग्रेस के लिए चुनौती है कि पार्टी एकबार फिर से जमीनी स्तर पर काम करे, लोगों के दिलों में एकबार फिर से विश्वास जगाए, वरिष्ठ नेताओं की अब जिम्मेवारी है कि राहुल गांधी के बाद अब पार्टी ऐसे कुशल नेतृत्व की तलाश करे, 2019 को निगाह में रखकर एक नए सिरे से तैयारियां शुरु की जाएं।

 -अभिलाष श्रीवास्तव