क्या राम और अयोध्या पर होगी केवल वोटों की राजनीति ?

क्या राम और अयोध्या पर होगी केवल वोटों की राजनीति ?

नई दिल्ली। चुनाव जो आए रामलला फिर याद आए मंदिर मस्जिद बने ना बिगड़े सोन चिरैया फंसी रहे। शायद राजनीति का विषय अब राम पर आ गया है। दशकों से रामजन्मभूमि विवाद को भाजपा राजनीति का केन्द्र बनाकर सत्ता में आए का स्वप्न देख रही थी। साल 2014 में चुनाव के दौरान भी रामलला याद किए गए। लेकिन अब सरकार दुबारा चुनावी दंगल खेलने उतरने वाली है लेकिन रामलला के हालात बदस्तूर वैसे ही है जैसे थे। आज भी अयोध्या राम के उस कठिन कालकोठरी से वापसी की राह देख रही है।

अगर बीते 4 सालों के वक्त को देखा जाए तो अयोध्या में राजनीति के नाम पर विधानसभा अयोध्या का विधायक भाजपा से मेयर भाजपा से और बड़ी बात है कि भाजपा की प्रदेश राजनीति की धुरी भी अयोध्या से चलती है। यहां मंदिर है और मंदिर में धर्म और धर्म से राजनीति हो रही है। साल 2014 के बाद आज तक माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या का रूख नहीं किया। ना ये जानने की कोशिश हुई की वादों की तस्वीर कैसी है।

अब जरा अयोध्या के हालात पर नजर डालें तो पता चलता है कि रोजगार के कोई अवसर ही नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक अड़चनों ने कई युवाओं को वंचित कर दिया है। अयोध्या में महज एक इंटर कॉलेज महाराज इंटर कॉलेज है जो कि अर्ध सरकारी है। बाकी प्राइवेट कॉलेजों की भरमार है लेकिन खुद पूर्ण शिक्षित ना होते हुए अध्यापक वहां पर बच्चों का भविष्य संवारने में लगे हैं। डिग्री कॉलेज के नाम पर कामता प्रसाद सुन्दर लाल साकेत महाविद्यालय है। बाकी 5 कोस की अयोध्या में कोई शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान मोदी सरकार का नहीं रहा है।

पर्यटन के क्षेत्र की बात करें तो मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मभूमि का गौरव अयोध्या को मिला है। लेकिन आज तक यहां के धार्मिक स्थलों का चिन्हीकरण और सौन्दर्य़करण नहीं हुआ है। ऐसे में अब राजनीति के दिग्गज अयोध्या में पर्यटन के लिहाज से क्या विकास करेंगे ये अज्ञात है। कांग्रेस की देन अयोध्या की रामपैड़ी कई बार बनी बिगड़ी 4 सालों से निर्माण हो रहा है।

लेकिन आज तक निर्माण पूर्ण अवस्था में नहीं आ पाया है। अब बात करें सड़कों की तो कई सडकें बनी लेकिन अब कहां है तो पता नहीं तो कही गढ्ढा है तो नहीं पानी का भराव ये है अयोध्या की तस्वीर। जहां 4 सालों में अयोध्या ही नहीं बदली तो राम मंदिर का प्रश्न शून्य हो जाता है। आज भी संकरी सडकें अयोध्या के बदहाल हकीकत बयां करती है। यूं तो कागजों में अयोध्या में पर्यटन के लिहाज से कई बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं। लेकिन 4 सालों के वक्त बीतने के बाद भी अयोध्या में केवल धूल ही उड़ रही है।

अगर बात करें प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण योजना स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय और विद्युतीकरण की तो ये दोनों योजनाएं लेकिन कागजों तक ही यहां सीमित रही है। वैसे तो अयोध्या का विद्युतीकरण बहुत पहले ही हो चुका था। लेकिन नई प्रणाली में अंडर ग्राउंड केबिल की व्यवस्था के लिए गढ्ढे खुदे और भरे गए। लाइने बिछाई गई दी गई लेकिन अभी तक पूरे अयोध्या को इससे नहीं जोड़ा जा सका है। आधी अधूरी योजनाओं का प्रारूप देखने को यहां सहजता से मिलता है। दूसरा अगर शौचालय की बात करें तो आज भी अयोध्या में आयोजित होने वाले 3 बड़े मेलों के बाद पूरी अयोध्या आए तीर्थयात्रियों के मल-मूत्र की दुर्गंध से बजबजाती है। ऐसे में शौचालय योजना का भी यहां बंटाधार हो गया है।

अगर देखा जाए तो बीते 4 सालों के रिकॉर्ड देखने से साफ जाहिर है कि अयोध्या में विकास की शुरूआत शून्य से महज एक कदम भी नहीं ठीक से चल पाई है। राम मंदिर बने ना बने अयोध्या आज भी अहने दर्द और सितम को देख रही और झेल रही है। अब खुद माननीय नरेन्द्र मोदी ने नवबर्ष की पूर्व संध्या को दिए गए इन्टव्यू में साफ किया है। राम मंदिर को लेकर सरकार को अध्यादेश नहीं लाएगी। मंदिर संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया से बनेगा। मतलब अब अयोध्या का दर्द केवल राजनीति का मसला बना है। राम पर केवल देश में राजनीति ही होगी।

अजस्र पीयूष