arjun 1 महाभारत में अर्जुन को जानबूझकर क्यों बना दिया था 'नापुंसक'?

महाभारत को हुए कई युग बीत चुके हैं लेकिन अभी भी महाभारत के अंदर कई ऐसे रहस्य और कहानियां छुपी हैं।

arjun 2 महाभारत में अर्जुन को जानबूझकर क्यों बना दिया था 'नापुंसक'?

अर्जुन, महाभारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण चरित्र रहे। उनके बारे में कहा जाता है कि यदि वह नहीं होते तो, कौरवों को युद्ध में हराना आसान नहीं होता। वीरता, साहस और सुंदरता जैसे कई गुण उनके उसके भीतर थे।

जिनके बारे में लोग जानना चाहते हैं। ऐसे ही एर रहस्य और कहानी महावीर अर्जुन की नापुंसकता को लेकर है। जिसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं।

आज हम आपको अर्जुन के नापुंसक बनाए जाने की कहानी बताने जा रहे हैं। जिसे जानकर आप हैरान हो जाएंगे।

ये घटना उस वक्त ही है जब पांडव वन में भटक रहे थे। इस बीच जब पांडव भाई वेदव्यास जी के आश्रम गए और अपनी सारी तकलीफों को वेदव्यास जी से बताया, तब युधिष्ठिर ने वेदव्यासजी से प्रार्थना करते हुए अपना राज्य पुनः पाने का कोई उपाय बताने को कहा।

वेद व्यास जी ने युधिष्ठिर से कहा कि अगर आप पुनः अपना राज्य प्राप्त करना चाहते हैं, तो उसके लिए दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता होगी।

इसलिए अर्जुन को कड़ी तपस्या करनी होगी, जिससे देवता प्रसन्न हो और अर्जुन को दिव्यास्त्र दे।वेदव्यास जी के द्वारा बताई राह पर चलते हुए अर्जुन तपस्या के लिए चल दिए।

उत्तराखंड के पर्वतों से होते हुए एक बेहद खूबसूरत वन में जा पहुंचे। वहीं शांत वातावरण में बैठकर शिवजी की तपस्या करने लगे। और भगवान शिव अर्जुन से प्रसन्न हो गये । और अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं और तुम्हें पशुपत्यास्त्र देता हूं।

भगवान शिव से ‘पशुपत्यास्त्र’ मिलने के बाद भी अर्जुन ने अपनी तपस्या खत्म नहीं की। वह दूसरे सभी देवताओं की विधिवत पूजा में लग गए।

जिसेक बाद इन्द्र उनके पास पहुंचे। उन्होंने कहा अर्जुन हम तुम्हारी तपस्या से खुश हुए हैं। इसलिए बताओ कि तुम्हारी क्या इच्छा है।

जैसा कि अर्जुन को भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे महारथियों को हराने के लिए दिव्य अस्त्र-शस्त्र की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने विनती की कि वह उन्हें प्रदान करें। एक पल की देरी न करते हुए देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

साथ ही कहा कि वह इंद्रलोक आए, ताकि वह इनके उपयोग की विद्या सीख सके।कुछ वक्त बाद दोबारा से इंद्र का सारथी वापस अर्जुन के पास आया और उन्हें अपने साथ स्वर्ग में ले गया। जहां पर वो विध्या सीखने लगे।

एक दिन की बात है जब अर्जुन चित्रसेन के पास नृत्य और संगीत सीख रहे थे, तभी वहां इंद्र की अप्सरा उर्वशी पहुंची। अर्जुन देख मोहित हो गई।

अवसर मिलते हीं उर्वशी ने अर्जुन से बोला कि हे अर्जुन आपको देखकर मेरी काम-वासना जाग गई है. अतः कृप्या कर मेरे साथ विहार करें और मेरी काम-वासना को शांत कीजिए।

इस पर अर्जुन ने कहा कि ‘हे देवी आप हमारी माता समान हैं. हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह कर हमारे वंश का गौरव बढ़ाया है।

आप पुरु वंश की जननी हैं. मैं आपको प्रणाम करता हूं.’ अर्जुन की बात सुन उर्वशी के मन में बड़ा क्षोभ हुआ और गुस्से में आकर अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप दे दिया – श्राप देते हुए कहा कि ‘तुमने नपुंसकों जैसी बात की है।

अतः तुम्हें मैं श्राप देती हूं कि तुम एक वर्ष के लिए पुंसत्वहीन रहोगे और फिर उर्वशी वहां से चली गई।

जब देवराज इंद्र को अर्जुन के नपुंसक होने का श्राप का पता चला तो उन्होंने अर्जुन से कहा कि ‘वत्स तुमने जैसा व्यवहार किया, वो तुम्हारे योग्य था।

उर्वशी का श्राप भी भगवान की इच्छा थी। यह सब तुम्हें अज्ञातवास के दौरान काम देगा। अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के दिनों में तुम पुंसत्वहीन हीं रहोगे और अज्ञातवास पूरा होने पर तुम्हें दोबारा से पुंसत्व प्राप्त हो जाएगी।

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इस तरह अर्जुन एक साल तक नापुंसक रहे। उसके बाद उन्होंने महाभारत जैसा युद्ध लड़ा भी और जीता भी। तो देखा आपने किस तरह से अर्जुन को एक साल तक नापुंसक रहना पड़ा क्योंकि ऐसा खुद ईश्वर चाहते थे।

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