महर्षि भारद्वाज और प्रयागराज का क्या है नाता, जानिए पूरा इतिहास

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे भारत में प्रयागराज आस्था के बड़े केंद्र के रूप में है। यहां पवित्र संगम के साथ- साथ अन्य बहुत सारे स्थल हैं, जिनकी भारतीय संस्कृति में काफी महत्ता है। शहर को समझने के लिए इतिहास को भी जानना आवश्यक हो जाता है।

महर्षि भारद्वाज ने बसाया शहर

पौराणिक कथाओं और हिंदू मान्यताओं के अनुसार सृष्टि रचनाकार भगवान ब्रह्मा के प्रथम यज्ञ से प्रयाग की उत्पत्ति हुई। वहीं प्रयाग को बसाने का मुख्य श्रेय महर्षि भारद्वाज को जाता है। बृहस्पति और ममता के सर्वश्रेष्ठ पुत्र महर्षि भारद्वाज प्रयाग के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने पूरे प्रयाग को बसाया था।

वह ज्ञान विज्ञान, वेद पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद और विमान शास्त्र के परम ज्ञानी थे। उन्होंने विद्या और शिक्षा के आदान-प्रदान के लिए प्रयाग में गुरुकुल का बहुत बड़ा केंद्र बनाया था। प्रयाग का शाब्दिक अर्थ ब्रह्मा द्वारा किए गए प्रथम यज्ञ से है, प्रथम शब्द का पहला अक्षर “प्र” तथा यज्ञ शब्द से “याग” को लेकर प्रयाग नाम की उत्पत्ति हुई है।

इतिहास में है इसका जिक्र

प्रयागराज में महर्षि भारद्वाज का आश्रम गंगा तट से थोड़ी दूरी पर आज भी विद्यमान है। पौराणिक पुस्तक रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम वनगमन के दौरान श्रृंगवेरपुर से होते हुए प्रयाग में आए थे। उनके साथ लक्ष्मण और सीता जी भी थीं।

यहां आकर सभी पहले गंगा तट पर बसे महर्षि भारद्वाज के आश्रम में आकर रुके थे। इधर एक रात्रि विश्राम करने के पश्चात महर्षि की आज्ञानुसार त्रिवेणी में स्नान कर चित्रकूट के लिए प्रस्थान कर गए थे।

भगवान के वनगमन के बाद श्री राम को वापस लाने के लिए उनके अनुज भरत भी यहां से होकर गये थे। चित्रकूट जाते वक्त भरत जी सर्वप्रथम महर्षि भारद्वाज के आश्रम में आये, यहां उनका आशीर्वाद प्राप्त करके आगे की तरफ बढ़े थे।

भारद्वाजेश्वर शिव की स्थापना

कथाओं के अनुसार बताया जाता है कि महर्षि भारद्वाज ने प्रयाग के इस आश्रम में एक शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे भारद्वाजेश्वर शिव के नाम से जाना जाता है। यह आज भी इस आश्रम परिसर में मौजूद है।

विमान के रचनाकार थे महर्षि

ग्रंथों के अनुसार महर्षि भारद्वाज ज्ञान विज्ञान की सभी तकनीकों के जानकार थे। इन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम विमान का निर्माण किया गया था। आपको बता दें कि विमान निर्माण के साथ-साथ उनके द्वारा बहुत सारे यंत्रों के भी निर्माण किए थे।

महर्षि भारद्वाज को हुई थी अमृत्व की प्राप्ति

इंद्र एवं ब्रह्मा से आयुर्वेद और सावित्री अग्नि जैसी विद्या प्राप्त करने वाले महर्षि भारद्वाज बहुत ही तेजस्वी थे। अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर उनको अमृत्व की हुई थी, जिसकी वजह से ऋषि भारद्वाज सर्वाधिक आयु वाले ऋषियों में से एक थे।

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