द्वितीय काशी बनने के पीछे की क्या है कथा, जाजमऊ में आज भी हैं इसके सबूत

कानपुर: द्वितीय काशी के नाम से आज भी जाजमऊ इलाके को जाना जाता है, यहां महदेव का बहुत पुराना मंदिर है। जहां महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही भक्तों का भारी जमावड़ा लगना शुरु हो गया है।

रात दो बजे से शुरु है जलाभिषेक

शिव भक्तों ने माँ गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाई, इसके बाद भोलेनाथ का गंगाजल और दूध से अभिषेक किया गया। अलग-अलग मंदिरों में बेलपत्र, धतूरा के साथ फूलों को चढ़ाकर महादेव के दरबार में पूजा-अर्चना की गई। वहीं शहर के जाजमऊ इलाके में त्रेतायुग के सिद्धनाथ मंदिर में रात दो बजे से ही भक्तों का जान सैलाब उमड़ने लगा था। जहां श्रद्धालुओं ने बाबा सिद्धनाथ का अभिषेक कर पूजा अर्चना की।

क्या है द्वितीय काशी की कहानी

यह मंदिर राजा ययाति के समय का है, ऐसी मान्यता है कि त्रेतायुग में जाजमऊ के स्थान पर राजा ययाति का महल हुआ हुआ करता था। राजा ययाति के सौ पुत्र भी थे, राजा को रात में भगवान शंकर स्वप्न में दिखाई दिए। उन्होंने राजा से कहा कि यदि तुम यहां सौ यज्ञ करवाओगे तो यह स्थान दूसरी काशी बन जाएगा।

महाशिवरात्रि 1 द्वितीय काशी बनने के पीछे की क्या है कथा, जाजमऊ में आज भी हैं इसके सबूत

जिसके बाद राजा ने अपने महल में यज्ञ कराना शुरू किया, लेकिन जब 99 यज्ञ हुए तभी एक कौवे ने हवन कुंड में हड्डी डाल कर यज्ञ भंग कर दिया। जिसके बाद राजा का पूरा महल पलट गया और यह स्थान दूसरी काशी बनने से रह गया, लेकिन आज भी लोग इसे द्वितीय काशी के नाम से ही जानते हैं।

काशी में आज हो रहा बम-बम भोले

वहीं बाबा काशी विश्वनाथ की नगरी में भी भक्त दूर-दूर से आज इकट्ठा हुए, सभी ने जलाभिषेक करके पूजा की। कोरोना काल के बाद महाशिवरात्रि का महत्व और बढ़ गया है। भक्त ईश्वर के दरबार में आकर मंगल की कामना कर रहे हैं, साथ ही उनका धन्यवाद भी दे रहे हैं।

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