January 25, 2022 4:57 pm
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कोतवाल बाबा काल भैरव के साथ 50 साल बाद हुआ ऐसा, मंदिर में लगे जयकारे  

कोतवाल बाबा काल भैरव के साथ 50 साल बाद हुआ ऐसा, मंदिर में लगे जयकारे  

वाराणसी: उत्‍तर प्रदेश के वाराणसी जिले में बाबा काल भैरव के मंदिर में 50 साल बाद ऐसी घटना घटी, जिसे देखकर हर कोई खुशी से झूम उठा। हुआ कुछ यूं कि 50 साल बाद काशी के कोतवाल बाबा कालभैरव ने अपना कलेवर छोड़ दिया है।

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मान्‍यता है कि काशी के कोतवाल बाबा कालभैरव अपने कलेवर तभी छोड़ते हैं, जब दुनिया पर कोई बड़ी विपत्ति आने वाली होती है। कलेवर छोड़ने का अर्थ होता है कि बाबा कालभैरव ने उस आपदा को खुद झेल लिया है। इससे पहले बाबा ने 14 साल पहले आंशिक रूप से (एक परत) से कलेवर छोड़ा था।

कलेवर को किया गया विसर्जित   

बाबा कालभैरव ने अपना कलेवर उस समय छोड़ा, जब भोर में मंगला आरती हो रही थी। बाबा के छूटे कलेवर पर नजर पड़ते ही मंदिर परिसर जयकारे, शंख ध्वनि और घंटा-घड़ियाल की टंकार से गूंज उठा। इसके बाद उस कलेवर को लाल वस्त्र में बांधकर पंचगंगा घाट ले जाया गया और फिर नाव से मध्यधार में ले जाकर कलेवर को विसर्जित कर दिया गया।

क्‍या है कलेवर की मान्‍यता?

दरअसल, काशी में बाबा कालभैरव को सिंदूर और चमेली के तेल का लेप लगाने की परंपरा रही है। इसके बाद पूजन की प्रक्रिया शुरू होती है। मंदिर व्यवस्थापक महंत नवीन गिरी के मुताबिक, पूर्वजों ने बताया था कि जब कोतवाल बाबा कालभैरव खुद अपना पूर्ण कलेवर छोड़ दें, तो समझिए कि बाबा ने देश और दुनिया की कोई बड़ी विपत्ति अपने ऊपर ले ली और लोगों को इस विपदा से बचा लिया है। आज से करीब 14 वर्ष पूर्व कलेवर की परत ने आंशिक रूप से बाबा के शरीर का साथ छोड़ा था, जबकि 50 साल पहले वर्ष 1971 में बाबा कालभैरव ने पूर्ण रूप से अपना कलेवर छोड़ा था।

इसके बाद अब कोतवाल बाबा के शरीर से कलेवर अलग हुआ तो पूजन के समय पूरा परिसर हर-हर महादेव के उद्घोष से गूंज उठा। हालांकि, इस दौरान बाबा के दरबार के कपाट बंद रहे। इसके बाद अर्चकों द्वारा बाबा का बाल स्वरूप श्रंगार और विशेष पूजन अर्चना की गई। फिर श्रद्धालुओं के लिए बाबा के कपाट खोल दिए गए। दोपहर बाद बाबा काल भैरव का सिंदूर, मोम और देशी घी से लेप करने के बाद उनके बाल रूवरूप को चांदी का मुखौटा लगाकर श्रंगार हुआ और महाआरती की गई।

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