September 21, 2021 4:46 pm
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कवि दिवस के रूप में मनाया जाती है मैथिलीशरण गुप्त की जयंती

कवि दिवस के रूप में मनाया जाती है मैथिलीशरण गुप्त की जयंती

लखनऊः हिंदी खड़ी बोली के प्रथम प्रख्यात राष्ट्र कवि पद्मभूषण मैथिली शरण गुप्त एक ऐसे महान भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें साहित्य जगत में दद्दा नाम से जाना जाता था। अपने कृतियों के लिए मशहूर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का पुण्यतिथि आज के दिन पूरे देश भर में कवि दिवस के रूप में मनाया जाता है।

जीवन परिचय

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 में उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चीरगांव में हुआ था। गुप्त के पिता सेठ रामचरण कनकने और माता काशीबाई वैष्णव थे। बचपना खेलकूद में गुजरने की वजह से गुप्त की शिक्षा अधूरी रह गई, लेकिन रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत के नेतृत्व में इन्हें स्कूल में पढ़ाया गया, जहां गुप्त ने हिंदी, संस्कृत और बंगला का अध्ययन किया।

12 वर्ष की उम्र में लिखना शुरू किया था काव्य संग्रह

मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी 12 वर्ष की उम्र में पहली बार ब्रज भाषा में कनक लता कविता लिखना शुरू किया। जिसके बाद इनकी प्रथम काव्य संग्रह “रंग में भंग” तथा बाद में “जयद्रथ वध” मासिक सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई।

गांधीजी ने दिया था मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि की उपाधि

वर्ष 1931 में मैथिली शरण गुप्त द्वारा अपने ग्रंथ साकेत और पंचवटी को पूर्ण करने के बाद उनका संपर्क राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से हुआ। गांधी जी के संपर्क में रहते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने वर्ष 1932 में यशोधरा नाम की कृति लिखी। जिस से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी।

व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने पर जाना पड़ा जेल

16 अप्रैल वर्ष 1941 में मैथिलीशरण गुप्त द्वारा एक व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर झांसी जेल में डाल दिया गया। झांसी जेल से उन्हें आगरा जेल ले जाया गया जहां आरोप सिद्ध ना होने पर उन्हें 7 महीने बाद बरी कर दिया गया।

78 वर्ष की आयु में गुप्त द्वारा लिखे गए सारी लेख

मैथिलीशरण गुप्त ने अपने पूरे 78 वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, 19 खंडकाव्य, काव्य गीत, नाटिकायें आदि लिखी, जो लोगों द्वारा काफी पसंद किया गया।

गुप्त का राजनीतिक दौर

मैथिलीशरण गुप्त वर्ष 1952-1964 तक राज्यसभा सदस्य रहे इस बीच 1953 में इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसी दौरान वर्ष 1962 मे राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मैथिलीशरण गुप्त को अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया।

दिल का दौरा पड़ने से हुआ निधन

साहित्य के चमकते हुए महान राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का निधन 12 दिसंबर 1964 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से हो गई, जिसके बाद पूरा साहित्य जगत शोक की लहर में डूब गया।

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