कठुआ और उन्नाव कांड पर विशेष- ना आना इस देश मेरी लाडो

नई दिल्ली। बलात्कार रेप दुष्कर्म ये सब शब्द जब सुनने को मिलते हैं तो कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। चंद मिनट के लिए जरा उस पल की कल्पना तो करें तो शरीर में सिरहन दौड़ जाती है। किसी महिला या बच्ची के साथ होने वाले सबसे गंभीर अपराधों में एक है ये अपराध, जिसमें उसका शरीर ही नहीं बल्कि मन और आत्मा भी आहत होती है। 16 दिसम्बर की रात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर सफेद बस में बलात्कार होता है। बलात्कार ही नहीं बल्कि मानसिक तौर पर उन विकलांग लोगों ने क्रूरता की पराकाष्ठा ही पार कर दी थी। जिसके बाद उस बच्ची को इस दुनियां से ही अलविदा होना पड़ा था। निर्भया शायद ये नाम ही दिया था, हमने कैंडिल मार्च से लेकर सड़क और संसद तक निर्भया कांड ने भारतीय जनमानस को झकझोर दिया था।

महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों को लेकर कठोर कानून की बात हुई। संसद और न्यायपालिका ने कानूनों में परिवर्तन किए। लेकिन क्या बलात्कार रूके ये यक्ष प्रश्न आज भी है। उस वक्त की सरकार पर कमजोर सरकार होने का लांछन लगा तो अब इस सरकार पर सरकारें तो आती जाती रहती हैं। कानूनों में बदलाव होते हैं, लेकिन अपराध हैं कि रूकते हैं। आज मां बाप अपनी बेटियों को लेकर इस देश में असुरक्षित महसूस करते हैं। आखिर इन सबका जिम्मेदार कौन है। आखिर बेटियां कहां सुरक्षित हैं कौन सा कानून उन्होने घर और बाहर सुरक्षित बना सकता है। इस बात का जबाव ना तो कानून में है ना ही कानून की किसी किताब में, ये एक ऐसा सवाल है जिसका जबाव किसी के पास मौजूद नहीं हैं।

धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर के कठुवा में हुई निर्ममता की घटना ने सभी को झकझोर दिया। लेकिन आखिर कब बलात्कार तो जनवरी में हुआ और हंगामा अप्रैल में देश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने तो कैंडिल मार्च इंडिया गेट पर निकाला आखिर कब अप्रैल में दो 4 महीने का समय लग गया ये समझने में कि वाकिया वाकई में गंभीर था। या फिर मौका की तलाश थी, इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को घेरने की अपनी सोई राजनीति को फिर से खड़ा करने की। निर्मया के समय यही कांग्रेस थी जब राहुल जी से संसद के बाहर सवाल पूछे गए थे। तब बिना जबाव दिए वो गाड़ी में सवार होकर निकल गए थे। आज सड़कों पर बैठकर बात कर रहे हैं। ठीक है बात तो होनी चाहिए आखिर सरकार क्या कदम उठा रही है। आरोपियो पर सख्त कार्रवाई में देरी क्यूं ये सवाल लाजिमी हैं।

लेकिन क्या इस सवालों में इंसाफ की कोई बू आती दिखाई दे रही है। या फिर साफ है कि कठुआ गैंगरेप में अब राजनीति दल केवल राजनीति की बिसात में अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। यहां कुछ सवाल है सत्ताधारी और विपक्षी दलों से आखिर इतना वक्त क्यूं लगा विपक्ष को कठुआ की बात पर सरकार को घेरने में। आखिर जब आज का सत्ताधारी दल कल तक विपक्ष में था। उस वक्त तो संसद में भाषण के दौरान वर्तमान विदेश मंत्री और तत्कालीन नेता विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि ऐसे घटनाओं से तो मेरा खून खौल उठता है, आज खून ठंडा क्यूं हैं क्या कठुआ में इस अपराध की शिकार हुई बेटी इस देश की सम्पत्ति नहीं थी। आखिर बेटियों की सुरक्षा कैसे होगी, सरकार ना तो आज की ना कल की सुरक्षा के नाम पर हुए सवालों का जबाव तो किसी के पास नहीं हैं।

ये देश साक्षी रहा है कि जब जब नारी का अपमान सहन हुआ है। या फिर सरकारें मौन रही हैं तो जनता का इंसाफ हुआ है। चाहे रामायण काल रहा हो या महाभारत महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जब भी कोई रावण या दुशासन आया है तो अंत होना तय है चाहे लंका का अंत हुआ हो या कुरू वंश का ये बात शायद इनती गंभीर है कि ना तो राहुल समझ सकते हैं ना ही माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लेकिन वक्त का तकाजा जरूर ही समझा देगा। क्योंकि इस देश में बेटियों के पूजन की परम्परा रही है। चाहे बेटी हिन्दू की हो या मुस्लमान ही बेटी तो बेटी होती है। बिटिया की कोई जात या धर्म नहीं होता उसकी जात और धर्म तो उसका मान होता है। जिसकी रक्षा करना समाज और सरकार का फर्ज है। ना हो समाज ही स्वच्छ है ना सरकार की भूमिका ऐसे में तो बस यही कहना होगा ना आना इस देश मेरी लाडो।

 अजस्रपीयूष शुक्ला