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पुलवामा के शहीदों को सलाम: मैं रहूं या न रहूं भारत ये रहना चाहिए

Thumb10 पुलवामा के शहीदों को सलाम: मैं रहूं या न रहूं भारत ये रहना चाहिए

लखनऊ। देश से है प्यार तो हरपल के कहना चाहिए, मैं रहूं न या न रहूं भारत ये रहना चाहिए। देश के लिए मर मिटने की शपथ लेने वाले भारतमाता के 40 जवान 14 फरवरी 2019 को आज के ही दिन पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। उनकी शहादत पर पूरे देश को गर्व है।

इस आतंकी हमले के बाद देशभर में गम और गुस्से की लहर दौड़ गई। शहीदों को नमन करने के बाद देश ने 12 दिन के अंदर ही पाकिस्तान से शहीदों की शहादत का बदला ले लिया। रविवार को पूरे देश ने शहीदों को याद किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी पुलवामा हमले की दूसरी बरसी पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। आइए जानते हैं देश पर शहीद होने वाले 40 जवानों की कहानी-
pulwama attack (2)
पुलवामा हमले में शहीद वीरेन्द्र सिंह सीआरपीएफ के 45 बटालियन में तैनात थे। वह उत्तराखंड के उधमसिंहनगर जिले के मोहम्मदपुर भूरिया गांव के रहने वाले थे। उनकी शहादत पर पूरे गांव को गर्व है।

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के रायपुर के रहने वाले अमित ने साल 2017 में सीआरपीफ को ज्वाइन किया था। वह अपने परिवार के पहले ऐसे व्यक्ति थे जो सेना का हिस्सा बने थे। परिवार को अपने इस बहादुर बेटे पर गर्व है।

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के कांस्टेबल पंकज कुमार त्रिपाठी हमले में शहीद हो गए थे। हमले वाले दिन सुबह 10 बजे उन्होंने अपनी पत्नी से फोन पर बात की थी। शाम को हमले की खबर आने के बाद घरवालों ने फोन मिलाया तो बेटे की शहादत की खबर आई।

उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ की बस पर हुए आत्मघाती हमले में शहीद प्रदीप सिंह यूपी के कन्नौज जिले के अजान गांव के रहने वाले थे। प्रदीप ने 2003 में सीआरपीएफ ज्वाइन की थी। तब से वह अलग-अलग लोकेश पर तैनात रहे।

श्याम बाबू उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में स्थित राइगवान, नोनारी के रहने वाले थे। 6 साल पहले वैवाहिक बंधन में बंधे श्याम बाबू को पहली पोस्टिंग साल 2005 में मिली थी। आतंकियों के हमले ने उन्हें उनके परिवार से दूर कर दिया।
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उत्तर प्रदेश के वाराणसी के रमेश यादव सीआरपीएफ के 61वीं बटालियन में कांस्टेबल  थे। पुलवामा आतंकी हमले में वह शहीद हो गए। बेटे की शहादत पर उनके परिवार को गर्व है। गांव के तमाम युवा उन्हें उदाहरण मानकर सेना में जाने की तैयारी कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के शहीद अवधेश कुमार यादव सीआरपीएफ के 45वीं बटालियन में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। वह जम्मू-कश्मीर में हुए आत्मघाती हमले में शहीद हो गए।

पुलवामा आतंकी हमले में तिलक राज शहीद हो गए थे। वह सीआरपीएफ की 76वीं बटालियन में तैनात थे। तिलकराज की शहादत पर उनके गांव को गर्व है। वहहिमाचल प्रदेश के ज्वाली के नाणा पंचायत के धेवा गांव के रहने वाले थे।

उन्नाव, उत्तर प्रदेश के अजीत कुमार आजाद उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रहने वाले थे। इस वीर सपूत ने देश के लिए अपना जीवन दे दिया। उन्होंने साल 2007 में अपनी पहली पोस्टिंग पाई थी।

मैनपुरी उत्तर प्रदेश के शहीद रामवकील सीआरपीएफ के 176वी बटालियन में हेड कांस्टेबल थे। आतंकी हमले से कुछ ही दिन पहले उनकी पत्नी से बात हुई थी। आतंकी हमले से ठीक पांच दिन पहले उनके पिता की सड़क हादसे में मौत हो  गई थी।

सीआरपीएफ के 35 बटालियन में कार्यरत शहीद अश्वनी कुमार काओची मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले थे। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे अश्वनी साल 2017 में सीआरपीएफ को ज्वाइन किया था। भाई बहनों के लिए वह उदाहरण है। सबको उनकी बहादुरी पर गर्व है।

शहीद कौशल कुमार रावत उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के केहराई गांव के रहने वाले थे। परिवार ने बताया कि उनसे हमले के एक दिन पहले फोन पर बात हुई थी जिसमें उन्होंने बताया था कि उनकी पोस्टिंग किसी दूसरे जगह हो गई है। जिसे उन्हें कल ज्वाइन करना है। इससे पहले कौशल कुमार सिलीगुड़ी में पोस्टेड थे।

शामली के प्रदीप कुमार इस हमले में शहीद हुए। प्रदीप कुमार ने साल 2003 में सीआरपीएफ को ज्वाइन किया था। परिवार के लोगों का कहना है कि वह हमेशा से देश के लिए कुछ करना चाहते थे। शहादत के बाद वह हमेशा के लिए अमर हो गए।
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मोगा पंजाब के शहीद जयमाल सिंह सीआरपीएफ के 76वीं बटालियन में हेड कांस्टेबल के पोस्ट पर कार्यरत थे। उनकी हमले के दिन सुबह में ही पत्नी से फोन पर बात हुई थी। जयमाल सिंह उस बस को चला रहे थे जिसे आतंकियों ने अपना निशाना बनाया।

पंजाब के गुरदासपुर जिले के दीनानगर के रहने वाले मनिंदर सिंह अत्री भी उस हमले में मात्र 27 साल की उम्र में शहीद हो गए। उनके छोटे भाई भी अर्धसैनिक बल में पोस्टेड हैं। पिता सतपाल अत्री रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं। उनकी खेलों में बहुत  रुचि थी।

शहीद नितिन शिवाजी राठौर महाराष्ट्र के रहने वाले थे। वह सीआरपीएफ के 03 बटालियन में कांस्टेबल पद पर कार्यरत थे। नितिन ने हमले के कुछ देर पहले ही अपनी पत्नी से बात की थी। किसी को यह नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी। वह आज भी उस पल को याद करके भावुक हो जाती हैं।

हेमराज मीणा राजस्थान के कोटा स्थित बिनोद कलां के रहने वाले थे। शहीद हेमराज अपने पीछे दो बेटे और दो बेटियों को छोड़कर गए हैं। पत्नी और बच्चों को उनकी शहादत पर गर्व है। उनके बेटे भी भारतीय सेना का हिस्सा बनना चाहते हैं।

जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के रहने वाले नसीर अहमद पुलवामा में हुए हमले में शहीद हो गए थे। वह 2014 में पुलावामा में आई भीषण बाढ़ के दौरान राहत और बचाव कार्य में शरीक हुए थे और ठीक 5 साल बाद उसी जगह पर शहीद भी हो गए।

प्रयागराज के तुदीहर बादली का पुरवा इलाके के महेश कुमार इस आतंकी हमले से कुछ ही दिन पहले एक सप्ताह की छुट्टी पर घर गए थे। जिसके बाद वापस आकर दोबारा ड्यूटी ज्वाइन की। लेकिन घरवालों को क्या पता था कि बेटा अब तिरंगे में लिपटकर ही आएगा। आतंकी हमले में वह शहीद हो गए।

शहीद विजय कुमार मौर्य सीआरपीएफ के 92वीं बटालियन में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। विजय यूपी के देवरिया जिले के छपिया जयदेव गांव के रहने वाले थे। विजय कुमार ने साल 2008 में सीआरपीएफ को ज्वाइन किया था। देश के लिए उनके बलिदान पर परिवार को गर्व है।

पंजाब के तरनतारन के सुखजिंदर सिंह को इस आतंकी हमले से सात महीने पहले ही प्रमोशन मिला था। तरक्की मिलने के बाद घर में बेटे गुरजोत सिंह ने जन्म लिया था। पति को खोने वाली सरबजीत कौर ने पति के शहादत पर गर्व जताया।

उड़ीसी के रतनपुर इलाके के मनोज कुमार बेहरा इस आतंकी हमले से पहले दिसंबर में घर गए थे। जहां उन्होंने अपनी बेटी का बर्थडे सेलिब्रेट किया था। इसके बाद वह 7 फरवरी को दोबारा ड्यूटी पर लौट गए थे। जम्मू कश्मीर में यह उनकी दूसरी पोस्टिंग थी।

शहीद विजय सोरेंग झारखंड के गुमला जिले के फरसामा के रहने वाले थे। विजय एक सप्ताह पहले ही घर आए हुए थे। उनके पिता भी सेना में है जबकि उनकी पत्नी भी झारखंड आर्म्ड पुलिस में हैं।

संता कुमार वीवी सीआरपीएफ के 82वीं बटालियन में कार्यरत थे। वह केरल के वायनाड स्थित कुन्नाथीडावाका लक्कीडी के रहने वाले थे। जिस दिन आतंकी हमला उससे उसी दिन बस में बैठने से पहले वसंता ने अपनी मां को फोन कर कहा था कि वह नई बटालियन को ज्वाइन करने के लिए जाने वाले हैं। मां बेटे के फोन का इंतजार करती रही मगर शहादत की खबर आई।

बिहार के तरगना इलाके के शहीद संजय कुमार सिन्हा सीआरपीएफ के 176 बटालियन में पोस्टेड थे। वह बिहार के पटना जिले के रहने वाले थे। इस आतंकी हमले से पहले वह महीने भर की छुट्टी बिताकर 8 फरवरी को वापस ड्यूटी पर लौटे थे। उन्होंने 15 दिन की छुट्टी पर आने का वादा किया था। मगर उनकी शहादत की खबर आई।

असम के कलबाड़ी इलाके के मनेश्वर सुमातारी आतंकी हमले से पहले एक महीने की छुट्टी बीताकर 4 फरवरी को दोबारा ड्यूटी पर लौटे थे। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि वह घर के नजदीक पोस्टिंग की कोशिश करेंगे। वह बोडो समुदाय के थे। मनेश्वर सीआरपीएफ के 98 बटालियन में पोस्टेड थे।

शहीद सी शिवचंद्रन ने हमले से ठीक पहले अपनी गर्भवती पत्नी से बात की थी। दोनों को यह पता नहीं था कि वो आखिरी बार बात कर रहे हैं। शिवचंद्रन ने साल 2010 में सीआरपीएफ ज्वाइन किया था। वह तमिलनाडु के रहने वाले थे। पंजाब के रौली इलाके के शहीद कुलविंदर ने हमले के दिन सुबह ही घर बात की थी और घर के मरम्मत को लेकर बातचीत की थी।

पुलवामा हमले में शहीद जीतराम राजस्थान के भरतपुर जिले के सुंदरवली के रहने वाले थे। वह सीआरपीएफ के 92वीं बटालियन में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। शहीद कांस्टेबल सुब्रमण्यम जी सीआरपीएफ के 82 बटालियन में कार्यरत थे। वह तमिलनाडु के तूतीकोरिन के रहने वाले थे। उन्होंने हमले के दिन दोपहर में कॉल कर घर अपनी पत्नी से बात की थी।

पश्चिम बंगाल के शहीद सुदीप बिस्वास अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य थे। उनके पिता सन्यासी बिस्वास फार्म में कर्मचारी हैं। सुदीप ने साल 2014 में सीआरपीएफ ज्वाइन को था। उनके जाने का परिवार को दुख है मगर उनकी शहादत पर गर्व भी है।

कर्नाटक के शहीद गुरू एच सीआरपीएफ के 82 बटालियन में कार्यरत थे। कुछ समय घर पर रहने के बाद उन्होंने 10 फरवरी को ड्यूटी दोबारा ज्वाइन की थी। उन्होंने श्रीनगर जाते हुए अपने घर पर बात की थी। तब किसी को पता नहीं था कि यह उनकी आखिरी बातचीत है।

पश्चिम बंगाल के बबलू संतारा सीआरपीएफ में हेडकांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने अगले महीने 3 मार्च को घर जाने का प्लान भी बनाया था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। वह इसके लिए टिकट की बुकिंग भी कर चुके थे। वह अपने नवनिर्मित घर की पेंटिंग के लिए गांव आने वाले थे।

शहीद प्रसन्ना कुमार साहू सीआरपीएफ के 61 बटालियन में कार्यरत थे। वह ओडिसा के जगतसिंह पुर के शिखर गांव के रहने वाले थे। राजस्थान के जैतपुर के शहीद भागीरथ सिंह सीआरपीएफ के 45वीं बटालियन में कांस्टेबल के पोस्ट पर कार्यरत थे। उन्होंने 6 साल पहले सीआरपीएफ को ज्वाइन किया था।

सीआरपीएफ के हेड कांस्टेबल नारायण लाल गुर्जर राजस्थान के राजसमंद जिले के बिनोल के रहने वाले थे। सीआरपीएफ के हेड कांस्टेबल शहीद संजय राजपूत 115 वीं बटालियन में तैनात थे। संजय ने साल 1996 में सीआरपीएफ ज्वाइन की थी। हमले के दिन दोपहर में उन्होंने अपने एक रिश्तेदार से फोन पर बात की थी। वह महाराष्ट्र के रहने वाले थे।

शहीद मोहन लाल सीआरपीएफ के 110 बटालियन में असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे। वह उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के बनकोट के रहने वाले थे। आतंकी हमले से साल भर पहले ही मोहन लाल ने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए फैमिली को देहरादून शिफ्ट किया था। उन्होंने साल 1988 में सीआरपीएफ ज्वाइन किया था।

सीआरपीएफ के 45 बटालियन में तैनात रतन कुमार ठाकुर ने हमले के कुछ ही देर पहले अपनी पत्नी से बात की थी। उन्होंने बातचीत में कहा था कि वह शाम तक श्रीनगर पहुंच जाएंगे। शहीद रतन ने साल 2011 में सीआरपीएफ ज्वाइन की थी। वह भागलपुर बिहार के रहने वाले थे।

शहीद रोहितास लांबा सीआरपीएफ के 76वीं बटालियन में कांस्टेबल के पोस्ट पर कार्यरत थे। वह राजस्थान के जयपुर जिले के गोविंदपुरा के रहने वाले थे। शहीद रोहितास पिछले साल 10 दिसंबर को पिता बने थे। लेकिन वह उस समय घर नहीं आ सके थे। वह जनवरी में अपने बेटे को देखने के लिए घर पहुंचे थे।

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