सीतारमन नए इनकम टैक्स स्लैब पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से पूछे गए सवाल, जाने क्या थे उनके जवाब

नई दिल्ली। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को कहा कि अब तक चली आ रही टैक्स व्यवस्था में 120 तरह के विकल्पों में छूट मिलती थी। इससे करदाताओं की वास्तविक क्षमता का पता लगाने में मुश्किल आ रही थी। ऐसे में नया और आसान विकल्प दिया गया है। वित्तमंत्री ने कहा कि लोगों पर एक साथ बोझ न पड़े, इसलिए पुराने विकल्प को भी बरकरार रखा गया है।

आम करदाता आयकर के नए विकल्प को लेकर असमंजस में हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि नया विकलप चुनें या फिर पुराने को ही अपनाना बेहतर रहेगा?

वित्त मंत्री ने कहा कि असमंजस बिल्कुल भी नहीं है। तस्वीर पूरी तरह से साफ है। दशकों से बजट में निवेश और दूसरी तरह की छूट के विकल्प बढ़ाए जा रहे थे। इससे न सिर्फ कर विभाग पर काम का बोझ बढ़ रहा था, बल्कि लोगों को भी टैक्स बचाने के लिए चार्टर्ड एकाउंटेंट को मोटी फीस देनी पड़ती थी। यही नहीं, उनके अलग-अलग मद में छूट का फायदा लेने से सरकार को यह पता लगाने में मुश्किल होती थी कि वास्तव में देश के करदाताओं में कितना टैक्स देने की क्षमता है? लिहाजा सरकार ने नई व्यवस्था के तहत टैक्स छूट के 120 विकल्पों में से 70 हटाए हैं। लोगों पर छूट के विकल्प छोड़ने का दबाव एक साथ न पड़े, इसलिए हमने पुरानी व्यवस्था भी बरकरार रखी है। सरकार ने लोगों को निवेश के लिए आजाद किया है। उन्हें निवेश करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।

बजट में टैक्स चार्टर के ऐलान की जरूरत क्यों पड़ी?

इस सवाल पर निर्मला सीतारमण का कहना है कि सरकार चाहती है कि करदाताओं के अधिकारों को कानूनी मान्यता दी जाए। उन्हें किसी तरह से परेशान न किया जाए। हमने विभिन्न विकसित देशों में लागू कानून का अध्ययन किया। इसके लिए मैंने वित्त मंत्रालय में तैयार किए गए सुझावों पर खुद प्रधानमंत्री के साथ चर्चा की। प्रधानमंत्री ने कहा कि ये जरूर किया जाना चाहिए। इसके बाद ही सरकार ने बजट में टैक्स चार्टर का ऐलान किया। हम चाहते हैं कि टैक्स अधिकारी किसी से व्यक्तिगत स्तर पर दुश्मनी निकालने के लिए नोटिस पर नोटिस न भेजें। नई व्यवस्था के तहत सिस्टम से मंजूरी मिलने पर ही लोगों को नोटिस भेजे जाएंगे।

सुस्ती से आर्थिक रफ्तार पिछले वर्षों के मुकाबले घटी है। आने वाले वर्षों में क्या हाल रहेगा?

सवाल का जवाब देते हुए उन्होने कहा कि हमारा लक्ष्य है कि आने वाले चार-पांच वर्षों में अर्थव्यवस्था लगातार दस फीसदी की दर से आगे बढ़े। निश्चित तौर पर इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बजट में और उसके बाहर कई ऐलान किए गए हैं। हमें उम्मीद है कि देश में हर तरफ से निवेश आएगा। इसका फायदा न सिर्फ अर्थव्यवस्था, बल्कि निवेशकों को भी मिलेगा। सरकार कृषि रेल और कृषि उड़ान योजना चलाएगी। इससे किसानों को उनके उत्पादों की बेहतर कीमत मिलेगी। साथ ही दूसरी तरह की आर्थिक गतिविधियां भी चलेंगी, जो रोजगार के अवसर पैदा कर अर्थव्यवस्था को गति देगी।

अर्थव्यवस्था को आखिर कैसे गति मिलेगी?

मौजूदा दौर में देश की अर्थव्यवस्था को किसी एक इंजन के सहारे तेजी से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को आगे आना होगा। सरकार ने निवेश और कानून व्यवस्था को आसान बनाकर विकास का रोडमैप तैयार कर दिया है। अब जरूरत है विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करने की। एक बार निवेश होना शुरू हो गया तो सीमेंट, आयरन, कृषि जैसे तमाम क्षेत्रों में विकास होगा और अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ने लगेगी।

बजट से उद्योग जगत निराश है। 

पिछले बजट के बाद ही हालात का आकलन कर मैंने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती का ऐलान किया था। सरकार ने इसके लिए अपने खजाने पर भी बोझ सहा है। छोटे कारोबारियों को आसान कर्ज दिया जाए, इसकी भी व्यवस्था की गई है। पर देखने को मिल रहा है कि उद्योग जगत उस रकम का इस्तेमाल पुराना कर्ज चुकाने या फिर बचत के लिए कर रहा है। सरकार की सहूलियतों का किस तरह से इस्तेमाल करना है, यह कॉरपोरेट जगत की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। अगर उद्योग अपनी रकम को खाली बैंक में ही रखेंगे तो भी हमें कोई नुकसान नहीं होगा। इससे भी तो हमारी बैंकिंग व्यवस्था सुधरती है और बैंक जयादा कर्ज देने की हालत में रहेंगे। अगले कुछ महीनों में उद्योग जगत निवेश करना शुरू करेगा और अच्छे नतीजे भी आएंगे।

बजट में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं दिखा, जिससे अंदाजा लगाया जा सके कि आखिर रोजगार के कितने अवसर पैदा होंगे?

देखिए हमने कृषि, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, पानी और बुनियादी ढांचा जैसे तमाम मोर्चों पर बजट में फंड दिया है। हम छोटे-छोटे ढांचों में निवेश कर रहे हैं, जो आने वाले समय में बेरोजगारी खत्म करेंगे। एक योजना का उदाहरण देती हूं। हम ‘सागर मित्र’ के नाम पर बड़े पैमाने पर लोगों की भर्ती कर उनका इस्तेमाल करेंगे, जैसे बैंकिंग क्षेत्र में बैंकिंग कॉरोस्पॉन्डेंट होते हैं। सरकार स्वयं सहायता समूहों को भी प्रशिक्षित कर कई मोर्चों पर उनका प्रयोग करेगी। इसके अलावा विभिन्न क्षेत्रों में पहल की जाएगी, ताकि कारोबार बढ़ने से नौकरियां पैदा हों। मौजूदा दौर में सरकार के पास नौकरियों का शुरुआती आकलन तो है, लेकिन हमने इसे बताया नहीं है क्योंकि अगले दिन से ही उस पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। हमने कुछ दिन असर देखने के बाद नौकरियों के सटीक आंकड़े बताने का फैसला लिया है।

विनिवेश के मोर्चे पर सरकार जितना सोच रही थी, उतनी सफलता नहीं मिली। भविष्य के लिए क्या रणनीति है?

मैं बीते साल जुलाई में वित्त मंत्री बनी थी। अगर मुझे कम से कम एक साल का समय मिलता तो मैं विनिवेश का लक्ष्य हासिल कर लेती। मेरे पद संभालने के बाद कंपनियों में विनिवेश का काम तेजी से शुरू किया गया है। सात महीने में कंपनियों की हालत सुधारकर उन्हें विनिवेश के लायक बनाने का काम किया गया है। जल्द ही उनमें हिस्सा बेचने का काम भी पूरा हो जाएगा। इस वित्त वर्ष के अंत तक कई परिणाम सामने आएंगे।

सरकार ने कई मदों में खर्च की रकम उनकी मांग के मुताबिक घटा दी है। मनरेगा उसमें से एक है। इसकी क्या वजह है? क्या जरूरत पड़ी तो इसे बढ़ाया जा सकेगा?

देखिए, जिस हिसाब से योजनाओं के लिए मांग की जाती है, उस हिसाब से केंद्र सरकार रकम आवंटित करती है। सभी योजनाओं में उपयुक्त आकलन के बाद रकम आवंटित की गई है। किसानों और ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं के लिए सरकार ने कुल 2.83 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है। ऐसे में बजट में कटौती का आरोप गलत है। रही बात मनरेगा की तो जिस हिसाब से मांग रही है, उस हिसाब से रकम आवंटित हुई है। आने वाले दिनों में अगर मांग बढ़ेगी तो सरकार ज्यादा रकम देगी।

कई वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने का फैसला क्यों लिया?

वित्त मंत्रालय में कई दौर की बैठकों के बाद मैंने विभिन्न वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने का फैसला लिया है। यहां मैं कहना चाहूंगी कि यह फैसला देशहित में लिया गया है। इससे भारतीय कारोबारियों को फायदा मिलेगा। जिन भी उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाई गई है, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जो देश में नहीं बनता हो। मैं यह दावे के साथ कह सकती हूं कि देश में बनने वाले उत्पादों की क्वाविटी विदेश में बनने वाले उत्पादों के बराबर या उनसे बेहतर है। ऐसे में लोगों को स्वदेशी उत्पाद ही खरीदने चाहिए। हम नहीं चाहते हैं कि ऐसे किसी भी उत्पाद पर, जो देश में बेहतर क्वालिटी में बन रहा हो, उस पर विदेशी मुद्रा खर्च कर आयात किया जाए। यदि कोई व्यक्तिगत तौर पर विदेश में बनी चीज खरीदना चाहता है तो उसे ज्यादा रकम देने में परहेज नहीं करना चाहिए। सरकार ने सिर्फ पूरी तरह से बने हुए उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाई है। कच्चे माल पर टैक्स का बोझ नहीं बढ़ाया गया है।

Rani Naqvi
Rani Naqvi is a Journalist and Working with www.bharatkhabar.com, She is dedicated to Digital Media and working for real journalism.

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