September 23, 2021 11:21 am
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कैसा रहा पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का राजनितिक सफर

प्रणब मुखर्जी

देश के 13 वें राष्ट्रपति रह चुके प्रणब मुखर्जी का राजनितिक सफर काफी लम्बा रहा है। इस कार्यकाल के दौरान उन्हें राजनीति में सम्मानित राजनेता के रूप में पहचान मिली। उन्हें भारत रत्न के सम्मान से सम्मानित किया गया था। प्रणब मुखर्जी एक ऐसे राजनेता रहे जिन्हे सभी दलों ने पूरा सम्मान दिया। जिसके चलते वो देश के राष्ट्रपति बने।

देश के राष्ट्रपति पद के लिए पर्चा भरकर प्रणब मुखर्जी जिंदगी और सियासत के एक अहम मुकाम पर पहुंच गए। इस मौके पर पूरी यूपीए एकजुट देखने को मिली। इसे प्रणब का जादू ही कहा जाएगा कि जब उनका पर्चा भरा गया, तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी भी एक साथ बैठी दिखी। प्रणब एक ऐसी शख्सियत थे, जिसके लिए राजनीतिक पार्टियां गठबंधन को दरकिनार करती दिखीं। और उन्होंने अपने प्रतिपक्षी प्रत्याशी पी.ए संगमा को हराया और 25 जुलाई 2012 को भारत के तेरहवें राष्ट्रपति बने। प्रणब मुखर्जी एक वरिष्ठ नेता रह चुके है उन्होंने 60 साल के राजनितिक करियर में भारत सरकार के अनेक महत्वपूर्ण मंत्रालयों और पदों पर काम किया है राष्ट्पति बनने से पहले वे यू.पी.ए गठबंधन सरकार में केंद्रीय वित्त मंत्री रह चुके थे।

इंदिरा ने प्रणब में देखा राजनेता

प्रणब मुखर्जी ने राजनीति की शुरुआत 60 के दशक में बांग्ला कांग्रेस से की थी। उन्होंने वी.के. कृष्ण मेनन के चुनाव प्रचार (मिदनापुर लोकसभा सीट के लिए उप-चुनाव) का सफल प्रबंधन किया। उनके कार्य को देखते हुए उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल किया। और जल्द ही वो जुलाई 1969 में राज्य सभा का सदस्य बनकर दिल्ली चले गए। तब दिल्ली में उनकी कोई खास पहचान नहीं थी। जिसके चलते वो सदन में पिछली लाइन में बैठने वालों में थे। सदन में उनके द्वारा दिया गया दूसरा भाषण लाजवाब रहा। खचाखच भरे सदन में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर भाषण देते प्रणब को देखकर इंदिरा गांधी प्रभावित हो गईं और इसके बाद इंदिरा तथा प्रणब की पहली मुलाकात हुई। जिसके बाद वो इंदिरा गांधी के करीबी और भरोसेमंद लोगों में शुमार हो गए। इसी के चलते इन्हे उद्योग मंत्री बनाया गया। इसके बाद ये कांग्रेस के बड़े लोगों में शुमार हो गए। राजीव गांधी के कार्यकाल को छोड़कर इन्हे हर कार्यकाल में अहम जिम्मेदारी दी गयी।

आपातकाल में प्रणब पर लगे आरोप

सन 1975-77 के आपातकाल के दौरान प्रणब पर गैर-संविधानिक तरीकों का उपयोग करने के आरोप लगे और जनता पार्टी द्वारा गठित ‘शाह आयोग’ ने उन्हें दोषी भी पाया। बाद में प्रणब इन सब आरोपों से बच निकल आये और सन 1982-84 में देश के वित्त मंत्री रहे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सरकार की वित्तीय दशा सुधारने में सफलता पायी। सन 1980 में उन्हें राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी का नेता बनाया गया। इस दौरान प्रणब मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे। इंदिरा गाँधी के हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था पर राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री बनते ही प्रणब को दरकिनार कर दिया गया। और उन्हें मन्त्रिमणडल में भी शामिल नहीं किया गया।

प्रणब ने नए दल का किया गठन

इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और अपने एक नई राजनीतिक दल ‘राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस’ का गठन किया। आगे चलकर उन्होंने सन 1989 में अपने दल का विलय कांग्रेस पार्टी में कर दिया। पी.वी. नरसिंह राव सरकार में उन्हें एक नया राजनीतिक जीवन मिला। जब उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया और सन 1995 में उन्हें विदेश मंत्री के तौर पर नियुक्त किया गया। जिसके बाद उन्होंने पहली बार विदेश मंत्री के रूप में कार्य किया। सन 1997 में प्रणब को उत्कृष्ट सांसद चुना गया। इसके बाद उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया।

लोगसभा में बनाई जगह

प्रणब मुखर्जी ने पहली बार लोकसभा के लिए चुनाव सन 2004 में लड़ा। पश्चिम बंगाल की जंगीपुर सीट इन्होने चुनाव लड़ा। जिसमे इन्होने विजय हासिल की। इसके बाद इन्हे लोकसभा में पार्टी का नेता चुना गया। सन 2004 से लेकर 2012 में राष्ट्रपति बनने तक प्रणब मुखर्जी यू.पी.ए. गठबंधन सरकार में कई महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आए। इस दौरान वे देश के रक्षा, वित्त और विदेश मंत्री रहे। इसी दौरान प्रणब मुखर्जी कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधान दल के मुखिया भी रहे।

भारत रत्न प्रणब मुखर्जी

वे हर वर्ष दुर्गा पूजा का त्योहार अपने पैतृक गांव मिरती (पश्चिम बंगाल) में ही मनाते थे। उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। भारत सरकार ने प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न के सम्मान से किया है। इसके अलावा उन्हें पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है। बूल्वरहैम्पटन और असम विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया है।

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