स्वतंत्रता सेनानी ‘पंडित गोविंद बल्लभ पंत’ के बारे में जाने यह खास बातें

नई दिल्ली। पंडित गोविंद बल्लभ पंत एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे। वह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। उन को संयुक्त प्रांत जो अब उत्तर प्रदेश के रूप में जाना जाता है का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता माना जाता था।

पंत का जन्म

गोविंद बल्लभ पंत 10 सितंबर 1887 को अल्मोड़ा में श्याही देवी पहाड़ी की ढलानों पर बसे खूँट गांव में एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। उनकी माता का नाम गोविंदी बाई था। उनके पिता मनोरथ पंत एक सरकारी अधिकारी थे और वह लगातार दौरों पर रहते थे। इसलिए गोविंद को उनके नाना, बद्री दत्त जोशी, ने पाला था।
पंत के दादा नाना भी एक सरकारी अधिकारी थे। जोशी जी ने पंत के व्यक्तित्व और राजनीतिक विचारों की रचना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वकालत का किया फैसला

गोविंद बल्लभ पंत ने आगे चल कर वकालत की पढाई कि और काशीपुर में वकालत शुरु की। इसके बाद पंत ने स्थानीय राजनीति में प्रवेश किया और कई अनुचित स्थानीय ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया। वह 1921 में आगरा और अवध संयुक्त प्रांत की विधान सभा के लिए भी चुने गए थे।
कांग्रेस पार्टी ने पंत को 9 अगस्त 1925 के काकोरी ट्रेन डकैती मामले में शामिल राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खाँ और अन्य क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने के लिए नियुक्त किया गया था।

जेल का सफर

1930 में पंत ने गांधी जी से प्रेरित होकर नमक मार्च का आयोजन किया था जिसकी वजह से अंग्रेजी शासको ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया और उनको जेल में बंद कर दिया। 1930 के बाद 1933 में भी पंत को जेल जाना पड़ा था। 1933 में ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को बैन कर दिया था लेकिन इसके बाद भी पंत ने उस सत्र में भाग लिया था और इस वजह से सरकार ने उनको 7 महीने के कारावास की सजा सुनाई थी।

कांग्रेस के उम्मीदवार के रुप में

पंत 1934 में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में विधान सभा के लिए चुने गए थे। कांग्रेस के नेता उनके राजनीतिक कौशल से प्रभावित थे और उनको विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का उप नेता भी बनाया गया था। गोविंद बल्लभ पंत 1937 से 1939 तक संयुक्त प्रांत( उत्तर प्रदेश) के मुख्यमंत्री रहे थे। 1940 में हुए सत्याग्रह आंदोलन में भी पंत ने हिस्सा लिया था और इस कारण उनको फिरसे गिरफ्तार किया गया था।

भारत छोड़ो प्रस्ताव का रहे हिस्सा

सन 1942 में गोविंद ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किया था जिस वजह से ब्रिटिश सरकार ने उनको एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया और कांग्रेस कार्य समिति के अन्य सदस्यों के साथ उनको मार्च, 1945 तक अहमदनगर किले में रखा गया था।

मुख्यमंत्री से केंद्रीय मंत्री तक का सफर

कांग्रेस पार्टी ने 1945 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता था और गोविंद बल्लभ पंत को फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था। साथ ही 1947 में भारत की आजादी के समय भी वह इसी पद पर थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी मुख्य उपलब्धि यह है कि उन्होंने जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया था। साथ ही उन्होंने हिंदू कोड बिल पारित करके हिंदू पुरुषों के लिए एकपत्नीत्व को अनिवार्य बना दिया और हिन्दू महिलाओं को तलाक और पैतृक संपत्ति में विरासत का अधिकार भी दिया। 1955 में पंत को लखनऊ से नई दिल्ली लाया गया और 3 जनवरी 1955 को पोर्टफोलियो के बिना ही उनको केंद्रीय मंत्री बनाया गया। वह 1955 से 1961 तक केंद्रीय गृह मंत्री के पद पर आसीन रहे। केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में उनकी मुख्य उपलब्धि भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन है। केंद्र सरकार और कई राज्यों में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाना भी उनके द्वार किया गया एक बड़ा काम है।

भारत रत्न से किया गया सम्मानित

26 जनवरी 1957 को गोविंद बल्लभ पंत को सबसे बड़े भारतीय नागरिक सम्मान, भारत रत्न, से सम्मानित किया गया था।

हार्ट अटेक से हुई थी मृत्यु

7 मार्च 1961 को हार्ट अटेक से 74 वर्ष की आयु में पंत का निधन हो गया। उस समय वह भारत के गृह मंत्री थे। देश में राष्ट्रीय महत्व के कई संस्थानों के नाम उन के नाम पर रखे गए हैं। नई दिल्ली में गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल, इलाहाबाद में गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान और पंतनगर में कृषि एवं प्रौद्योगिकी गोविंद बल्लभ पंत विश्वविद्यालय ऐसे कुछ संस्थान हैं। उनके पुत्र, कृष्ण चंद्र पंत, भी एक राजनीतिज्ञ और केंद्रीय मंत्री थे।