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पौराणिक वाद्य यंत्र धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर, जाने क्यों खो रही वाद्य यंत्र ढोल ,मसक, रणसिंगां

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उत्तरकाशी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में विश्वनाथ भूतपूर्व सैनिक कल्याण समिति के द्वारा आयोजित दीपावली मेले में ढोल सागर प्रतियोगिता का आयोजन किया। क्योंकि हमारे पौराणिक वाद्य यंत्र ढोल ,मसक, रणसिंगां आदि विलुप्ति की कगार पर है। इनको बजाने वाले बजगियों का कहना है कि आज लोग पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध के पीछे भाग रहे हैं और अपनी पौराणिक संस्कृति को छोड़ रहे जिसके कारण हमारी पौराणिक संस्कृति जिसमें हमारे पौराणिक वाद्य यंत्र भी आते हैं। धीरे-2 विलुप्त हो रहे है।आज आवश्यकता है इनको जीवित रखने की।

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ये जीवित रहेंगे तो हमारी पौराणिक संस्कृति भी जीवित रहेगी। वही उत्तरकाशी में पूर्व सैनिक कल्याण समिति द्वारा सैनिक मेले में प्रतिवर्ष ढोल सागर प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है ताकि यह संस्कृति जीवित रहे। 1983 में भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के द्वारा ढोल विधा में पुरस्कृत ढोल विधा के ज्ञाता उत्तम दास कहते हैं। कि आज हमारे वाद्य यंत्र, विलुप्त हो रही है मैं लगातार लंबे समय से अपनी इस पौराणिक संस्कृति को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा हूं।

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वहीं उत्तम दास कहते है कि ढोल विधा में असंख्या ताल है। ज्योतिषाचार्य भी कहते हैं कि 33 करोड़ देवताओं के ताल छंद, तर्क, वितर्क ढोल विधा में अलंकृत है मेरे दादाजी ने ढोल में एक बार बागांबरी ताल बजाया था तो ताल बजाने पर बाघ आ गया था। इतना ही नहीं आज हमारी पुरानी संस्कृति धीरे धीरे विलुप्त हो रही है जिसको संवर्धन और संरक्षण करने की आवश्यकता है सरकार को पौराणिक वाद्य यंत्रों के संवर्धन और संरक्षण के लिए कार्य करना चाहिए।

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