September 28, 2021 11:02 pm
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मुंशी प्रेमचंद की जयंती आज: जानिए कुछ अनसुने किस्से, और कैसा रहा उनका संघर्ष

munshi premchandra मुंशी प्रेमचंद की जयंती आज: जानिए कुछ अनसुने किस्से, और कैसा रहा उनका संघर्ष

उपन्यास और कहानियों के सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की आज जयंती है। प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य में कहानियों का सम्राट माना जाता है। कहते हैं कि किसी भी लेखक का लेखन जब समाज की गरीबी, शोषण, अन्याय और उत्पीड़न का लिखित दस्तावेज बन जाए तो वो लेखक अमर हो जाता है। प्रेमचंद ऐसे ही लेखक थे।

गोरखपुर के तुर्कमानपुर में बीता बचपन

धनपत राय ‘मुंशी प्रेमचंद’ का जन्म बनारस के लमही में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। उनका बचपन गोरखपुर के तुर्कमानपुर मोहल्ले में ही बीता। शिक्षा विभाग की नौकरी के दौरान उनका तबादला हुआ तो वो 1916 में गोरखपुर दोबारा आए। उन्होंने बेतियाहाता स्थित मुंशी प्रेमचंद पार्क में स्थित निकेतन को अपना आशियाना बनाया। और उस निकेतन में तबतक रहे, जब तक उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र नहीं दे दिया।

संघर्षपूर्ण था धनपतराय से प्रेमचंद बनने का सफर

धनपतराय से प्रेमचंद बनने का सफर बड़ा भावुक है। दरअसल प्रेमचंद की उम्र 8 साल की ही थी जब उनकी मां दुनिया छोड़ कर चली गई। जैसे ही मां की मृत्यु हुई प्रेमचंद के पिता ने दूसरी शादी कर ली। इस वजह से प्रेमचंद एक बालक के तौर पर मां के जिस प्रेम और स्नेह को चाहते थे उसे ना पा सके। उनका जीवन गरीबी में ही पला। उनके पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं होते थे, और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन होता था। इससे भी ज्यादा मुश्किल उनके लिए अपनी सौतेली मां का व्यवहार था।

जब टूटा आर्थिक विपत्तियों का पहाड़

प्रेमचंद के पिता ने उनकी शादी 15 साल की उम्र में करवा दी। शादी के लगभग एक साल बाद उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद अचानक उनके सिर पर पूरे घर की जिम्मेदारी आ गई। प्रेमचन्द पर छोटी उम्र में ही ऐसी आर्थिक विपत्तियों का पहाड़ टूटा कि उन्हें पैसे के अभाव में अपना कोट बेचना पड़ा। इतना ही नहीं खर्च चलाने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तकें भी बेच दी।

तमाम परिस्थियों में पढ़ने का रहा शौक

हालांकि प्रेमचंद को इन तमाम परिस्थियों में भी पढ़ने का शौक रहा। प्रेमचंद ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक की। प्रेमचंद पढ़-लिखकर एक वकील बनना चाहते थे, मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने-जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहां ट्यूशन लिया। उससे पांच रुपया मिलता था। पांच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को दे देते थे जबकि बाकी बचे दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश में रहते। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने मैट्रिक पास किया।

संवेदनहीनता को कागज पर उकेरते थे प्रेमचंद

प्रेमचंद जैसे लेखक सिर्फ उपन्यास या कहानी की रचना नहीं करते बल्कि वो गोदान में होरी की बेबसी दिखाते हैं तो कफन में घीसू और माधव की गरीबी और उस गरीबी से जन्मी संवेदनहीनता जैसे विषय जब कागज पर उकेरते हैं। जिसे पढ़कर पाठक का कलेजा बाहर आ जाता है। उन्होंने रहस्य, रोमांच और तिलिस्म को अपने साहित्य में जगह नहीं दी बल्कि धनिया, झुनिया, सूरदास और होरी जैसे पात्रों से साहित्य को एक नई पहचान दी जो यथार्थ पर आधारित था।

‘वर्तमान समय का कोढ़ राष्ट्रवाद’

आज पूरे देश में राष्ट्रवाद पर खूब चर्चा होती है। लेकिन प्रेमचंद के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ आज के राष्ट्रवाद की तरह संकीर्ण नहीं बल्कि बहुत व्यापक थी। उनका मानना था कि जैसे मध्यकालीन समाज का कोढ़ सांप्रदायिकता थी, वैसे ही वर्तमान समय का कोढ़ राष्ट्रवाद है।

प्रेमचंद का मानना था कि जैसे सांप्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, और उसे उस बनाए घेरे से बाहर की चीजों को मिटाने में ज़रा भी संकोच नहीं होता था ठीक उसी तरह राष्ट्रीयता भी है। जो अपने परिमित क्षेत्र के अंदर रामराज्य का आयोजन करती है। प्रेमचंद अन्तर्राष्ट्रीयता के प्रचार पर जोर देते थे और उनका मानना था कि एक जागरूक समाज संसार में यही करती है।

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