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Lucknow: बीबीएयू के प्रोफेसर राम ने किया कमाल, इस बड़ी तकनीक के लिए मिला पेटेंट

बीबीएयू के प्रो0 राम चंद्रा को शहरी मलजल एवं औद्योगिक उत्स्राव के शोधन हेतु नवीन तकनीकी के विकास पर प्राप्त हुआ पेटेंट

लखनऊ: सूक्ष्म जीवाणुओं (बैक्टिरिया) एवं कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड ट्रीटमेंट सिस्टम पर आधारित एक नवीन तकनीकी विकसित करने के लिए बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ के प्रो0 राम चंद्रा को पेटेंट प्राप्त हुआ है। इस आविष्कार से अब उद्योगों से निकले कचरे से प्रदूषित होने वाले जल एवं शहरी मलजल (सीवेज) के शोधन तथा उसके पुनर्चक्रण में सहयोग मिलेगा।

औद्योगिक उत्स्राव एवं शहरी मलजल (सीवेज) का सुरक्षात्मक निस्तारण देश के लिए सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है। क्योकि, इसके द्वारा वातावरण प्रदुषण के साथ नदी एवं अन्य जलश्रोत प्रत्यक्ष रूप से प्रदूषित होते है। सरकार द्वारा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषित जल को शोधन के उपरांत उसके सुरक्षित निस्तारण के लिए कई नियम बनाए गए हैं और विभिन्न परियोजनाए भी चलाई गई हैं। परन्तु, उपयुक्त तकनीकी की कमी के कारण औद्योगिक इकाइयों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित इन मानक को पूरा करने में काफी मुश्किल होती थी। इसको देखते हुए भारत सरकार की तरफ से माननीय प्रधानमंत्री के निर्देश पर नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत प्रदूषित जल के शोधन तथा उपयुक्त रीसाइक्लिंग तकनीकी इज़ात करने के लिए विभिन्न शोध संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में कार्यरत वैज्ञानिकों को आमंत्रित किया गया था। इस सन्दर्भ में लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग द्वारा वित्तपोषित परियोजना के अंतर्गत सूक्ष्म जीवाणुओं (बैक्टिरिया) एवं कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड ट्रीटमेंट सिस्टम पर आधारित एक नवीन तकनीकी विकसित की गई है जिसपर ऑस्ट्रेलियन पेटेंट किया है। इस तकनीकी के माध्यम से शहरी मलजल (सीवेज) एवं कागज कारखानों के द्वारा निकलने वाले उत्स्राव को शोधन के उपरांत उसे री-सायकिल करके पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है।

इस तकनीकी में प्रथम चरण पर सूक्ष्म जीवाणुओं (बैक्टिरिया) उचित वातावरण में उन प्रदूषकों को विघटित कर देते है जो आसानी से टूट सकते है, जिसके फलस्वरूप प्रदूषित पानी की विषाक्तता कम हो जाती है। तदोपरांत द्वितीय स्तर पर बचे हुए हट्ठधर्मी प्रदूषक जो कि जल में घुलनशील होते है उनको गंदे पानी के शोधन के दौरान विघटित करके हटाने के लिए कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड ट्रीटमेंट सिस्टम का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक विशेष प्रकार के पौधों (जैसे:- फ्रैग्माइटिस कुमोनिस एवं टाइफा लैटीफोलिया) के द्वारा डिज़ाइन की गयी तकनीकी है जिसमे प्रयुक्त पौधों की जड़ों में निहित कुछ अन्य प्रकार के जीवाणु संयुक्त रूप से कार्य करते है जिससे बचे हुये प्रदूषक भी विघटित हो जाते है और शोधित जल को पर्यावरण संतुलन एवं मानव जीवन के विकास हेतु विभिन्न उपयोग में लाया जा सकता है ।

इस तकनीकी के विकास हेतु भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग के द्वारा वित्तपोषित परियोजना के अंतर्गत कई वर्षों के सतत प्रयास के फलस्वरूप इस नवीन तकनीकी को विकसित किया गया है। अब आवश्यक है कि इस तरह की तकनीकी एवं विषेशज्ञों की क्षमता का उपयोग जमीनी स्तर पर मेक इन इंडिया परियोजना के अंतर्गत किया जाए, जो देश के विकास में वरदान साबित हो सकती है।

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