जानिए: हुसैनी ब्राह्मणों का सच

नई दिल्ली। आज तक आपने सिर्फ ब्राह्मणों के बारे में सुना होगा लेकिन हुसैनी ब्राह्मण कौन है ये शायद ही कुछ लोग जानते होंगे। आज हम आपको उन्हीं हुसैनी ब्राह्मणों के बारे में बताने जा रहे हैं। हुसैनी ब्राह्मण महाभारत कालीन अश्र्वत्थामा से जुड़ी मान्यता के मुताबिक ब्राह्मणों का ये एसा वर्ग है जो अपने को हुसैनी ब्राह्मण कहलाने पर गर्व करते हैं।

husaini brahmin
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द्रोणाचार्य दत्त शाखा के मोहियाली ब्राह्मण थे। लोग बताते हैं कि युद्ध में घायल अश्वत्थामा किसी तरह बच निकला और इराक (मेसोपोटामिया) पहुंचकर वहीं बस गया। अश्वत्थामा वंश के दत्त ब्राह्मणों ने इराक में अपनी बहादुरी का सिक्का जमाया। वे अरब, मध्य एशिया, अफगानिस्तान और इराक में फैल गए। उन्होंने यहीं अपना साम्राज्य स्थापित किया। 1 ऐसे शुरू हुई हुसैन की भक्ति1मोहम्मद साहब के काल में दत्त ब्राह्मणों का राजा राहिब सिद्ध दत्त था। अपने साधूओं जैसे आचरण के कारण वह राहिब कहलाया। नि:संतान सिद्ध दत्त मोहम्मद साहब से संतान का आर्शीवाद मांगने मदीना गया।

वहां उसे पता चला कि उसके भाग्य में औलाद नहीं है। मायूस हो कर वह लौट रहा था कि उसी समय मोहम्मद साहब के छोटे नाती हुसैन अपने नाना के साथ वहां आ रहे थे। वह निराश सिद्धदत्त को दोबारा मोहम्मद साहब के पास ले गए। नाना से सारी बात सुनकर इमाम हुसैन ने उसे सात औलादों का आशीष दिया। सिद्ध दत्त खुशी खुशी वापस आ गया। अल्लाह ने हुसैन के आशीष की लाज रख ली। उसके घर सात बेटों का जन्म हुआ, जिनके नाम सहस राय, हर्ष राय, शेर खां, राय पुन, राम सिंह, चारू और पुरु रखे गए।

बता दें कि पुत्र की प्राप्ति के बाद सिद्ध दत्त मोहम्मद साहब के खानदान का भक्त हो गया। इमाम हुसैन के पिता हजरत अली के विरुद्ध लड़ी गई जमल की जंग में हजरत अली ने खजाने की सुरक्षा दत्त ब्राह्मणों के सशस्त्र दस्ते को सौंपी। कर्बला की दुखद घटना के समय अकेले बगदाद मे 1400 ब्राह्मण रहते थे। राहिब सिंह दत्त इमाम हुसैन का एहसान नहीं भूला था। इसीलिए जब इमाम हुसैन का दस्ता कर्बला की ओर जा रहा था उसके सैनिकों का दस्ता इमाम के साथ गया। बाद में इमाम इमाम के कहने पर दस्ता लौट गया क्योंकि इमाम काफिले को सेना में नहीं बदलना चाहते थे।

वहीं जब दस अक्टूबर 680 को कर्बला की घटना घटी और सिद्ध दत्त को पता चला तो उसे बहुत क्षोभ हुआ। जब उसे पता चला कि यजीदी फौज इमाम हुसैन के सिर को लेकर कूफा में वहां के यजीदी गर्वनर इब्ने जियाद के महल ला रहे हैं तो उसने यजीदी दस्ते का पीछा कर हुसैन का सिर छीना और दमिश्क की ओर बढ़ा। रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और हुसैन के सिर की मांग की। सिद्ध दत्त ने इमाम का सिर बचाने के लिए अपने पुत्र का सिर काट कर दे दिया पर सैनिक नहीं माने। हुसैन का सिर बचाने के लिए सिद्ध दत्त ने अपने सातों पुत्रों का सिर काट डाला लेकिन सैनिकों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने से इंकार कर दिया।1दत्त ब्राह्मणों के दिल में इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने की आग भड़क रही थी। इसी कारण वे अमीर मुख्तार के साथ मिल गए।

साथ ही बहादुरी से लड़ते हुए चुन चुन कर हुसैन के कातिलों से बदला लिया। कूफे के गवर्नर इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसे गिरा दिया गया। इस कुर्बानी को याद रखने के लिए दत्त ब्राह्मणों ने दर्जनों दोहे पढ़े जो मोहर्रम में उनके घरों में पढ़े जाते थे। यही दत्त ब्राह्मण हुसैनी ब्राह्मण कहलाए। बाद में शासकों ने शियों के साथ हुसैनी ब्राह्मणों पर भी जुल्म ढाना शुरू किया तो वे सीरिया, एशिया का चक और बसरा होते हुए अफगानिस्तान की ओर आए वहां उन्होंने गजनी, बल्ख, बुखारा, और कंधार पर कब्जा कर लिया। बाद में सिंध के अटक क्षेत्र से होते हुए वह पंजाब आ गए। दत्त सुल्तानों के बारे में कहा जाता है कि वह आधे हिंदू और आधे मुसलमान हैं।

द्रोणाचार्य दत्त शाखा के मोहियाली ब्राह्मण थे। लोग बताते हैं कि युद्ध में घायल अश्वत्थामा किसी तरह बच निकला और इराक (मेसोपोटामिया) पहुंचकर वहीं बस गया। अश्वत्थामा वंश के दत्त ब्राह्मणों ने इराक में अपनी बहादुरी का सिक्का जमाया। वे अरब, मध्य एशिया, अफगानिस्तान और इराक में फैल गए। उन्होंने यहीं अपना साम्राज्य स्थापित किया। ऐसे शुरू हुई हुसैन की भक्ति मोहम्मद साहब के काल में दत्त ब्राह्मणों का राजा राहिब सिद्ध दत्त था। अपने साधूओं जैसे आचरण के कारण वह राहिब कहलाया। नि:संतान सिद्ध दत्त मोहम्मद साहब से संतान का आर्शीवाद मांगने मदीना गया। वहां उसे पता चला कि उसके भाग्य में औलाद नहीं है। मायूस हो कर वह लौट रहा था कि उसी समय मोहम्मद साहब के छोटे नाती हुसैन अपने नाना के साथ वहां आ रहे थे। वह निराश सिद्धदत्त को दोबारा मोहम्मद साहब के पास ले गए। नाना से सारी बात सुनकर इमाम हुसैन ने उसे सात औलादों का आशीष दिया। सिद्ध दत्त खुशी खुशी वापस आ गया।

  रानी नक़वी