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कल्याण सिंह ने चुनावी हार के बाद जब कार्यकर्ताओं को खिलाई मिठाई

जब कार्यकर्ताओं को खिलाई मिठाई

Brij Nandan

लखनऊ। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह गांव की पगडंडियों से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुँचे थे। जनसंघ से लेकर भाजपा को मजबूत करने के लिए उन्होंने प्रदेशभर का दौरा किया। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अभिमान गर्व या बनावटी पना उनके अंदर रंच मात्र भी नहीं था। उनकी सहजता और आत्मीयता सबको अपना बना लेती थी।

उनके बेटे सांसद राजवीर सिंह के अनुसार जब बाबू जी (कल्याण सिंह) 1980 में चुनाव हारकर आये और कमरे में बैठे। उस समय उन्होंने लड्डू और बताशे मंगवाए। उस समय गर्मी का सीजन था। अपने सभी समर्थकों और कार्यकर्ताओं को लड्डू बताशा और तरबूज खिलवाया। मिठाई जैसी चीजें आदमी खुशी में खिलाता है। चुनाव हारने के बाद लोगों को गुस्सा आता है लेकिन बाबू जी ने सबको लड्डू खिलवाया। जीत की खुशी के अनुभव से ज्यादा वे हार के महत्व को देते थे।

 

कल्याण सिंह की सफलता के पीछे उनकी पत्नी का भी योगदान कम नहीं रहा। उनकी पत्नी रामवती का मौन त्याग ही है जिसने कल्याण सिंह को नेता कल्याण सिंह बनाया। पति की सामाजिक और राजनैतिक व्यस्तताओं के चलते उन्होंने परिवार और बच्चों को संभाला। उन्होंने अपने पति की तरक्की के आगे व्यक्तिगत सुख की अपेक्षा कभी नहीं की। वर्ष 1961 की डायरी में 14 अक्टूबर को वे लिखते हैं कि भूखे का सबसे बड़ा धर्म रोटी है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे छात्रों को सफलता का मंत्र देते हैं ठीक वैसे ही मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपने समय में छात्रों को परीक्षा के समय पत्र लिखते थे। वह कहते थे परीक्षा एक खेल तमाशा है इससे घबराना नहीं चाहिए। स्वास्थ्य,परीक्षा और दैनिक दिनचर्या आदि सबके बारे में इतना सहज दिशा निर्देश देते थे कि उनके पत्र इतने प्रभावी होते थे कि लगता था मानो कल्याण सिंह स्वयं आकर हमें बता रहे हैं।

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