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चीन ने सोलोमन द्वीप से क्यों किया सुरक्षा समझौता, जानें ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका को कैसे खतरा

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ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका ने सोलोमन द्वीप के साथ समझौते को चीन का नया शक्ति प्रदर्शन करार दिया है।

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तीनों देशों का मानना है कि चीन-सोलोमन द्वीप का सुरक्षा समझौता इस क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा है। पिछले महीने की इस सौदे की एक अनवेरिफाइड कॉपी ऑनलाइन लीक हो गई थी।

बीजिंग

चीन के प्रशांत महासागर के एक छोटे से द्वीपीय देश सोलोमन द्वीप के साथ सुरक्षा समझौता होने से बवाल मचा हुआ है। इस समझौते के सार्वजनिक होते ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने नाराजगी का इजहार किया है। इन तीनों देशों का मानना है कि चीन प्रशांत क्षेत्र में अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए एक कमजोर देश को निशाना बना रहा है। वहीं, चीन का दावा है कि यह सोलोमन द्वीप में शांति और स्थिरता बनाने के उद्देश्य से एक पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौता है। सोलोमन द्वीप की आबादी मात्र 6.87 लाख है, जो पिछले साल चीन विरोधी प्रदर्शनों के कारण हिंसा की आग में झुलस गया था। इसके बावजूद सोलोमन के नेताओं ने चीन के साथ सुरक्षा समझौता किया है।

सोलोमन के साथ सुरक्षा समझौता चीन का शक्ति प्रदर्शन

ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका ने इस समझौते को चीन का नया शक्ति प्रदर्शन करार दिया है। तीनों देशों का मानना है कि चीन-सोलोमन द्वीप का सुरक्षा समझौता इस क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा है। पिछले महीने की इस सौदे की एक अनवेरिफाइड कॉपी ऑनलाइन लीक हो गई थी। इस समझौते का सबसे ज्यादा असर ऑस्ट्रेलिया के ऊपर पड़ने की आशंका है। दरअसल, इस समझौते के कारण चीन को सोलोमन द्वीप में सैन्य अड्डा स्थापित करने की छूट मिल जाएगी, जो प्रशांत महासागर के इलाके में चीन का पहला सैन्य अड्डा होगा। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की चिंताओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस समझौते को रोकने की उम्मीद में अपने एक प्रतिनिधिमंडल को सोलोमन द्वीप भेजा था।

अमेरिका को मात देकर चीन ने किया समझौते का ऐलान

जबतक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल सोलोमन द्वीप के ऊपर दबाव बनाता उससे पहले ही चीन ने बड़ी धूमधाम से इस समझौते पर हस्ताक्षर होने का ऐलान कर दिया। हालांकि अंतिम समझौते का विवरण जारी नहीं किया गया है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ऑस्ट्रेलिया के सामने सुरक्षा की चुनौतियां पैदा होंगी और अमेरिका भी इससे अछूता नहीं रहेगा। इतना ही नहीं, इस समझौते से सोलोमन द्वीप समूह के और ज्यादा अस्थिर होने का खतरा भी बढ़ गया है। पहले भी इस द्वीपीय देश में चीन के साथ संबंधों को लेकर काफी हिंसा हो चुकी है। ऐसे में अगर सोलोमन द्वीप समूह पर हिंसा होती है तो इसका सीधा असर पास स्थित सबसे बड़े देश ऑस्ट्रेलिया पर पड़ना स्वाभाविक है।

अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया की चीन को लेकर नीति अस्पष्ट

राजनीतिक और सुरक्षा आशंकाओं से परे, विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति ऑस्ट्रेलिया और उसके सहयोगियों के लिए अपनी नीतियों की जांच करने का मौका है। उन्हें चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के पूर्व मुख्य सलाहकार और वर्तमान में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में स्ट्रैटजिक स्टडी के एक एमेरिटस प्रोफेसर ह्यूग व्हाइट ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका अभी भी चीनी शक्ति की वास्तविकता को लेकर जागरूक नहीं हुए हैं। उन्हें यह नहीं पता है कि हम इससे कैसे निपटने जा रहे हैं। कैनबरा और वाशिंगटन दोनों सोचते हैं कि किसी तरह हम चीन को दूर कर सकते हैं और उसे वापस उसके क्षेत्र में भेज सकते हैं।

चीन और सोलोमन द्वीप में समझौता कैसे हुआ

चीन और सोलोमन द्वीप में सुरक्षा समझौते की चर्चा पिछले कई महीनों से जारी थी। एक लीक हुए मसौदा दस्तावेज़ के अनुसार इस समझौते के बाद सोलोमन द्वीप के पास चीन से पुलिस या सैन्य कर्मियों से सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने या आपदा राहत में मदद करने का अनुरोध करने की क्षमता होगी। यह समझौता पिछले साल नवंबर में सोलोमन की राजधानी होनियारा में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। तब लोगों ने सोलोमन दीप के ताइवान के साथ संबंधों को खत्म करने और चीन के साथ दोस्ती बढ़ाने का विरोध किया था, जिसने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया।

अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया ने बताया इंडो-पैसिफिक के लिए खतरा

लेकिन दूसरे देशों की सबसे बड़ी चिंता सोलोमन द्वीप चीन के सैन्य उपस्थिति से है। एक संयुक्त बयान में, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने कहा कि यह समझौता एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक के लिए गंभीर खतरा है। वहीं सोलोमन द्वीप के प्रधानमंत्री मनश्शे सोगावरे ने बुधवार को जोर देकर कहा कि इस समझौते में चीन को सैन्य अड्डा स्थापित करने की अनुमति शामिल नहीं है। उन्होंने आलोचकों से देश के संप्रभु हितों का सम्मान करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हमने चीन के साथ एक समझौता किया है, जिसमें हमारी आंखें खुली हैं, जो हमारे राष्ट्रीय हितों के अनुसार है।

चीन ने किया बचाव, बोला- समझौते से किसी को भी खतरा नहीं

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने जोर देकर कहा कि खुला, पारदर्शी और समावेशी समझौता किसी तीसरे पक्ष को निशाना नहीं बनाता है। लेकिन आश्वासन के बावजूद, अभी भी इस बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है कि दोनों देशों के बीच क्या समझौता हुआ है। ऐसे में आलोचकों का मानना है कि यह अपने आप में चिंताजनक है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के ह्यूग व्हाइट ने कहा अभी भी बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते कि समझौता वास्तव में क्या कहता है, और यह भी कि इससे क्या होगा। विशेषत्रों का मानना है कि यह संभावना नहीं है कि चीन सोलोमन में एक पारंपरिक सैन्य अड्डे का निर्माण करेगा क्योंकि इससे सोलोमन द्वीप में चीन के खिलाफ एक नकारात्मक माहौल बनने का खतरा है।

इस समझौते से भविष्य में क्या होगा?

समझौते में क्या है, इसके बारे में सार्वजनिक विवरण की कमी न केवल सोलोमन द्वीप बल्कि बाकी देशों को भी चिंता में डाले हुए है। ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट में प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलियाई विदेश नीति के विशेषज्ञ मिहाई सोरा ने चीनी मिलिट्री बेस को लेकर चिंता जताई। उन्होंने सोलोमन द्वीप की तुलना जिबूती से किया, जहां चीन का पबले से ही सैन्य अड्डा मौजूद है। चीन ने जिबूती के साथ भी ऐसा ही समझौता किया था, जिसे एक लॉजिस्टिक फैसिलिटी के रूप में बताया गया था, लेकिन बाद में यह नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित हो गया। सोलोमन ऑस्ट्रेलिया के उत्तरपूर्वी तट से लगभग 1,600 किलोमीटर दूर है। इसका मतलब होगा कि इस समझौते के परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया कम सुरक्षित है।

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