शहीद दिवस पर वीरो के बलिदान को करे याद-दे श्रध्दाजंलि

नई दिल्ली। आज भारत को आजाद हुए कई साल हो चुके हैं। आज हम एक आजाद देश में गुलामी से दूर सांस लेते हैं पर इस आजाद चैन की सांस हमें कैसे मिली किन शूरवीरो ंने हमें इस आजादी को दिलाया आप सभी को याद होगा भले ही हमने उन वीरों को नहीं देखा पर उनकी शहादत के किस कहानियां हमने जरूर पढ़ी और सुनी होगी जिन्हें सुनकर ही हमारें अंदर देश के प्रति ऐसी दिवानगी पैदा हो जाती हैं। आज पूरा देश शहीद दिवस मनारहा उन शूरवीरों को याद कर रहा हैं जिन्होनें हमें एक आजाद भारत दिया एक ऐसे भारत में हमें जीने का शौभाग्य दिया जिस पर हम फर्क से कह सके कि हां मेैं भारतवासी हूं।

आज 23 मार्च यानि शहीद दिवस हैं जब अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त हमारे देश में चारों ओर हाहाकार मची हुई थी तो ऐसे में इस वीर भूमि ने अनेक वीर सपूत पैदा किए जिन्होंने अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने की खातिर अनेकों संघर्षपूर्ण प्रयत्न करते हुए हंसते-हंसते देश की खातिर प्राण न्यौछावर कर दिए। पर इस शहीद दिवस पर तीन दोस्तों को हमेशा याद किया जाता हैं जिसने ंआजादी के लिए देश के लोगों में एक ऐसी ज्वाला पैदा की जिसने तबतक हार नहीं मानी जब तक अंग्रेजो को भारत से बाहर ना निकाल फेंक दिया।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तीन ऐसे दोस्त जो शहीद जरूर हो गए पर अपनी शहादत के साथ कई भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को पैदा कर गए। आज  भी यें हमारे ंअंदर जिंदा हैं और हमेशा जिंदा रहेगें और तब तब जिंदा होगें जब कभी भारत की आजादी की बात होगी तब तब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पैदा होगें। जिसनें आज हमे भारत पर गर्व करने का मौका दिया और अपनी ज्वाला की आग ब्रिटिश सरकार में लगा।

क्यो डरने लगे थें अंग्रेज

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव कहने को तो तीन थें पर लइन तीनों ने ही ब्रिटिश सरकार के दांत खट्टें कर दिए थे जिसके चलते ब्रिटिस सरकार की ओर से इन्हें एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई। दरअसल भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने भारत को आजाद कराने ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर दिया था जिसके चलते इन तीनो को जेल में डाला गया और 24 मार्च का फांसी देने का निर्णय किया गया पर इनकी आजादी की ललक को देखते हुए ब्रिटिश सरकार डर गई और अपने डर के चलते इन्हें 23 मार्च को ही फांसी दे दी गई क्योकि अंग्रेज भयभीत थे कि कहीं विद्रोह न हो जाए। इसी को मद्देनजर रखते हुए उन्होंने एक दिन पहले यानी 23 मार्च 1931 की रात को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी और चोरी-छिपे उनके शवों को जंगल में ले जाकर जला दिया। जब लोगों को इस बात का पता चला तो वे गुस्से में उधर भागे आए। अपनी जान बचाने और सबूत मिटाने के लिए अंग्रेजों ने उन वीरों की अधजली लाशों को बड़ी बेरहमी से नदी में फिकवा दिया। छोटी उम्र में आजादी के दीवाने तीनों युवा अपने देश पर कुर्बान हो गए। आज भी ये तीनों युवा पीढ़ी के आदर्श हैं

तभी से इस दिन को शहीद दिवस का नाम दे दिया जिसमे ंहर शहीद की शहादत को  इस दिन याद किया जाता हैं । शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु इन तीनों की शहादत को पूरा संसार सम्मान की नजर से देखता है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।  जहां एक तरफ भगत सिंह और सुखदेव कालेज के युवा स्टूडैंट्स के रूप में भारत को आजाद कराने का सपना पाले थे, वहीं दूसरी ओर राजगुरु विद्याध्ययन के साथ कसरत के काफी शौकीन थे और उनका निशाना भी काफी तेज था।

चंद्रशेखर आजाद के क्रातीकारी विचार

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की कहानी से ही जुड़ी हैं चंद्रशेखर आजाद की कहानी जिनके ही विचारों से प्रेतित होकर इन्होनें एक आजाद भारत का सपना देखा और ना सिर्फ सपना देखा बल्कि उस सपने को पूरा करने के लिए अपनी जान तक की परवाद नहीं की। और भारत को आजाद कराने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका को दर्ज की। आजाद के विचारों से प्रभावित होकर एक क्रांतिकारी दल बनाया गय़ा। जिसका उद्देश्य था सेवा और त्याग की भावना जिस भावना का मकसद थाकि  देश पर प्राण न्यौछावर कर सकने वाले नौजवानों को तैयार करना। जिसकी झलक देखने को मिली जब लाला लाजपतराय जी की मौत हुई जिसके बाद  17 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स पर गोलियां चलाईं और पहली बार विरोध की ज्वाला लोगों में देखने को मिली। हालाकिं उस विरोध का मतलब किसी की हत्या करना नहीं था बस अंग्रजों में अपना खौंफ पैदा करना था जिससे वो इस देश को छोड़कर चले जाएं। ब्रिटिश सरकार के प्रति उनका यें विरोध काफी समय से फलफूल रहा था पर उनका ये ंविरोध उस समय ज्वाला बन गया ।मजदूर विरोधी नीतियों ने उनके भीतर आक्रोश भड़का दिया था। अंग्रेजों को यह जताने के लिए कि अब उनके अत्याचारों से तंग आकर पूरा भारत जाग उठा है, भगत सिंह ने केंद्रीय असैंबली में बम फैंकने की योजना बनाई। वह यह भी चाहते थे कि किसी भी तरह का खून-खराबा न हो।

इस काम के लिए उनके दल की सर्वसम्मति से भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त को इस काम के लिए चुना गया।  इस कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असैम्बली में ऐसी जगह बम फैंके गए थे जहां कोई मौजूद नहीं था। भगत सिंह चाहते तो वहां से भाग सकते थे लेकिन उन्होंने वहीं अपनी गिरफ्तारी दी। ‘इंकलाब-जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए उन्होंने कई पर्चे हवा में उछाले ताकि लोगों तक उनका संदेश पहुंच सके। वह एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे जहां सभी संबंध समानता पर आधारित हों व हरेक को उसकी मेहनत का पूरा हक मिले। अक्तूबर 1929 को भगत सिंह ने जेल से एक पत्र भारत के युवाओं के नाम लिखा जिसमें उन्हें संदेश दिया गया था कि स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है। जेल में इन तीनों और साथियों पर अत्याचार किए गए। लम्बी चली इनकी भूख-हड़ताल को तोडऩे के लिए अंग्रेजों ने अमानवीय यातनाएं दीं लेकिन वे विफल रहे। छोटी आयु में ही देश पर जान कुर्बान करने का शौभाग्य इन्हें मिला और इनकी वीरों की कुर्बानी बेकार नहीं गई क्योकि फिर तीन शहीद तो शहीद हो गए पर अपने साथ कई भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पैदा कर गए जो आज भी लोगों के अंदर जिंदा हैं और जब जब भारत की आजादी की बात की जाएगी इन शूरवीरों को हमेशा याद किया जाएंगा