लोकसभा के प्रश्नों का उत्तर प्रदेश कैसे दे पाएगा जवाब? जनता के मुद्दों का क्या होगा जनाब?

लोकसभा के प्रश्नों का उत्तर प्रदेश कैसे दे पाएगा जवाब? जनता के मुद्दों का क्या होगा जनाब?

एजेंसी, लखनऊ। कहते हैं दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। देश की राजनीति का दिल है उत्तर प्रदेश। इस बार इस दिल की धड़कनें कुछ ज्यादा ही तेज हैं। कारण भी कई हैं। लोकसभा चुनाव में पहली बार एसपी और बीएसपी एक साथ हैं। पहली बार कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा ने कमान संभाली है। 2014 की तुलना में विपक्ष ज्यादा आक्रामक है। केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अपने कामों की बदौलत वोट मांगने की तैयारी में है।

करीब बीस साल बाद केंद्र और राज्य में बीजेपी की सरकार है। बीजेपी अभी भी मोदीमय है पर इस बार उसे योगी का मजबूत साथ भी है। पीएम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी पिछली बार की तरह इस बार भी यूपी से ही चुनाव लड़ेंगे। इस बार यूपी की सियासी परीक्षा पास करना सभी दलों के लिए बड़ी चुनौती है।

बीजेपी को 2014 दोहराने की चुनौती

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 80 में से 71 और सहयोगी अपना दल को 2 यानी कुल 73 सीटें मिली थीं। हालांकि उपचुनाव में बीजेपी ने गोरखपुर और फूलपुर जैसी महत्वपूर्ण सीटें गंवा दी थीं। बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ओबीसी वोट को संभालकर रखने की है। 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में इसी वोट की बदौलत पार्टी ने ऐतिसाहिक जीत हासिल की थी। बीजेपी के सहयोगी दल अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से भी उसके संबंध पहले जैसे नहीं रहे हैं। जहां तक चुनाव प्रबंधन की बात है तो बीजेपी विपक्षियों से काफी आगे है। पार्टी बूथ स्तर तक के सम्मेलन कर चुकी है।

एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन

गठबंधन ने बीजेपी को प्रदेश भर में घेरने की तैयारी की है लेकिन गठबंधन की असली चुनौती आपस में तालमेल को लेकर है। सवाल ये है कि क्या एसपी-बीएसपी का वोट एक दूसरे को ट्रांसफर होगा। खासतौर से शिवपाल के मैदान में आने और कांग्रेस के अलग लड़ने के बाद। हालांकि मायावती और अखिलेश यादव ने अभी तक बहुत परिपक्वता का परिचय दिया है। दोनों ही धुर विरोधी दलों का ये गठबंधन उतना आसान था नहीं जितनी आसानी से हो गया है।

पहले-दूसरे चरण में बीएसपी की प्रतिष्ठा दांव पर

पहले और दूसरे चरण की 16 सीटों में से गठबंधन की ओर से बीएसपी दस पर चुनाव लड़ रही है। है। तीन पर एसपी और तीन पर आरएलडी खड़ी है। इस तरह से यूपी में बीजेपी को रोकने की शुरुआती जिम्मेदारी मायावती के जिम्मे है। पश्चिमी यूपी की इन सीटों पर आरएलडी का भी प्रभाव है।

कांग्रेस ने अपनाया आक्रामक रुख

एसपी-बीएसपी द्वारा ठुकराए जाने के बाद कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपनाया है। कांग्रेस ने अपने ब्रह्मास्त्र यानी प्रियंका गांधी वाड्रा को मैदान में उतार दिया है लेकिन चुनाव प्रबंधन के नजरिए से कांग्रेस अभी बहुत पीछे है। प्रियंका भी एक बार यूपी आने के बाद अभी तक दोबारा नहीं आई हैं। कांग्रेस पर एसपी-बीएसपी गठबंधन की मदद करने का दबाव भी है। अगर कांग्रेस पूरी ताकत से चुनाव नहीं लड़ी तो उसे कुछ खास हासिल नहीं होने वाला। कुल मिलाकर एक बार फिर उत्तर प्रदेश राजनीतिक सवालों का उत्तर देने के लिए तैयार है, साथ ही देश की राजनीति में अपना महत्व बनाए रखने के लिए भी।