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फुलैरा दूज और होली का क्या है पौराणिक महत्व, जानिए कब मनाया जाता है यह पर्व

फुलैरा दूज और होली का क्या है पौराणिक महत्व, जानिए कब मनाया जाता है यह पर्व

मथुरा: फुलैरा दूज होली के पहले का संकेत होता है, इसी के बाद से होली की धूम शुरु हो जाती है। इस दिन कई तरह की तैयारियां और आयोजन होते हैं। फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यह मनाई जाती है।

इस बार 15 मार्च को है पर्व

फुलैरा दूज इस बार 15 मार्च को पड़ रही है, इसी दिन से होली का रंग दिखना शुरु हो जाता है। गांव में जिस जगह पर होली जलनी होती है, वहां उपले इत्यादि रखकर तैयारी शुरु कर दी जाती है। ये उपले होली का प्रतीकात्मक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। होली के रंग और खुमार धीरे-धीरे लोगों पर चढ़ना शुरु हो जाता है।

फुलैरा दूज और होली का क्या है पौराणिक महत्व, जानिए कब मनाया जाता है यह पर्व

इस दिन होता है अबूझ मुहूर्त

भगवान की कृपा इस दिन रहती है, इसीलिए फुलैरा दूज को शुभ कार्यों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस दिन शादी जैसे आयोजन किसी भी मुहूर्त में किए जा सकते हैं। शास्त्र कहता है कि यह दिन बहुत ही शुभ और मंगलकारी होता है।

इसी दिन राधा कृष्ण का फूलों इत्यादि से श्रृंगार किया जाता है, मान्यता है कि भगवान स्वयं होली खेलने आते हैं। सभी अपने घरों में इसी दिन से रंगोली को भी बनाना शुरु कर देते हैं, जो होली के दिन तक जारी रहती है। इस रंगोली का निर्माण गुलाल और आटे से किया जता है।

गुलरियों बनाने का भी रिवाज

होलिका दहन में गोबर से बने उपलों का भी जलावन के तौर पर इस्तेमाल होता है। छोटे-छोटे गोल उपलों को बनाकर माला की तरह से पिरो लिया जाता है, फिर इसे होलिका दहन वाले दिन अग्नि में डाल देते हैं। इसी को गुलरियां कहते हैं। इनको बनाने का काम भी इसी दूज वाले दिन से शुरु कर दिया जाता है।

ब्रज में फुलैरा दूज के दिन अलग रौनक देखने को मिलती है, सारे धाम को फूलों से सजाया जाता है। सभी एक दूसरे के साथ फूलों से ही होली खेलते हैं। पूरे ब्रज मंडल का माहौल ही बदल जाता है, इसी दिन से होली तक यह धूमधाम लगातार जारी रहती है।

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