कोर्ट के फैसले के बाद ज्ञानवापी मस्जिद विवाद ने पकड़ा तूल, ओवैसी ने दिया विवादास्पद बयान, जानिए क्या है सच्चाई

वाराणसी: वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के मूल स्थान को लेकर कोर्ट में चल रहे विवाद में नया मोड़ सामने आ गया है। काशी विश्वनाथ मंदिर के पक्ष में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फैसला सुना दिया है।

वाराणसी की सिविल कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मंदिर के प्रमाण ढूंढे जाएंगे। इसके लिए कोर्ट ने पुरातात्विक सर्वे कराने के पक्ष में फैसला सुनाया है।

मंदिर के अवशेष खोजेगी पुराविद टीम

पुरातत्व विभाग की पांच लोगों की टीम ज्ञानवापी मस्जिद में मंदिर के अवशेष खोजेगी। इस टीम में तीन हिंदू तो दो मुस्लिम समुदाय के सदस्य होंगे। इस फैसले से हिंदू समुदाय में जहां खुशी की लहर दौड़ गई है, वहीं मुस्लिम समुदाय ने इस फैसले पर निराशा जताई है और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का निर्णय लिया है।

अधिवक्ता ने दायर की थी याचिका

बता दें कि काशी विश्वनाथ के मूल स्थान के लिए ये याचिका दिसबंर 2019 में अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने वाराणसी के सिविल कोर्ट में दायर की थी।

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इस याचिका में उन्होंने अनुरोध किया था कि संपूर्ण ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का पुरातत्व सर्वेक्षण करवाया जाए और मंदिर के अवशेषों को खोजा जाए। उन्होंने कहा था कि ज्ञानवापी मस्जिद के नीचे हिंदुओं का 2000 साल पुराना विश्वनाथ मंदिर था। इसे औरंगजेब ने ध्वस्त करके इसके अवशेषों से यहां मस्जिद का निर्माण किया था।

कोर्ट में सौंपे गए दस्तावेज

ज्ञानवापी मस्जिद की सच्चाई चाहे जो हो लेकिन ये मामला अब एएसआई के पास जा चुका है और वो ही इसकी सच्चाई का पता लगाएगी। इससे ये भी पता चल जाएगा कि उस स्थान पर पहले से ही मस्जिद थी या मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है।

हिंदू संगठनों ने कोर्ट में सबूत के तौर पर तीन सौ साल पुराने दस्तावेज दिए हैं। ये दस्तावेज फारसी भी भाषा में है जिसमें कथित तौर पर औरंगजेब के दरबार में ये बताया जा रहा है कि औरंगजेब के हुक्म को पूरा करते हुए मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया है।

क्या है विवाद

बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का ये विवाद मुगलकाल से चला आ रहा है। हिंदू समुदाय की मान्यता है कि वर्तमान की ज्ञानवापी मस्जिद ही असल में काशी विश्वनाथ मंदिर है। और काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ही ये मस्जिद बनाई गई थी।

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हिंदुओं का मानना है कि ज्ञानवापी मस्जिद के नीचे विशाल हिंदू मंदिर दबा हुआ है। इसके लिए हिंदू समुदाय तमाम तरह के सबूत का भी दावा करता हैं। वहीं मुस्लिम समुदाय मानता है कि किसी भी मंदिर को तोड़कर ये मस्जिद नहीं बनाई गई है।

याचिकाकर्ता समेत हिंदू लोग इस बात को मानते हैं कि 1669 में तत्कालीन मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करवा दिया था। वहीं एक किताब में भी औरंगजेब के कारनामों का उल्लेख मिलता है। इस किताब का नाम मासिर आई आलमगिरी है।

क्या कहता है इतिहास

असल में बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद की इस जगह का जिक्र एक ब्रिटिश सैलानी रेगिनेल्ड हेबर ने 1824 में किया था। उन्होंने यहां पर भ्रमण करने के बाद कहा था कि जैसा कि मस्जिद का निर्माण दिखता है, यहां पर कभी हिंदू मंदिर रहा होगा।

जो बाद में मस्जिद बन गया। इसी के साथ एक दूसरे पुरातत्व विशेषज्ञ एडविन ग्रीव्स ने भी अपनी किताब में लिखा था कि मस्जिद की झलक देखने पर ये किसी हिंदू मंदिर की तरह लगती है।

दरअसल यहां सबसे बड़ी बात ये है कि ज्ञानवापी मस्जिद के ठीक बाहर एक नंदी की विशाल मूर्ति है। ये वाहन शिव जी का है और नंदी की दिशा भी मस्जिद की ही तरफ है। ऐसे ही कई सबूत इस मस्जिद को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।

11वीं सदी में शुरू हुआ था मंदिर का निर्माण

कहा जाता है कि ज्ञानवापी के तथाकथित काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 11 सदी में बनना शुरू हुआ था। राजा हरीशचंद्र ने इसका कायाकल्प किया था।

इसके बाद तमाम हिंदू राजा इस मंदिर की देखभाल और सुंदरीकरण करते रहे। इसके बाद औरंगजेब के राज में इस मंदिर को तुड़वाया गया और यहां पर मस्जिद बनवा दी गई। इस बीच ये मंदिर कई बार बनता और बिगड़ता रहा।

रानी अहिल्याबाई ने दोबारा बनवाया मंदिर

इसके बाद 1780 में रानी अहिल्याबाई ने मंदिर के टूटने और मस्जिद के बनने के बाद इसके बगल में खाली पड़ी जमीन पर मंदिर बनवा दिया। ये ही आज का काशी विश्वनाथ मंदिर है जिसकी ख्याति पूरे विश्व में फैली है। ये मंदिर पूरे विश्व में फैले हिंदू समुदाय के लिए आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र है।

राजनीति में कूदे महारथी

वहीं जैसे ही सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मंदिर के अवशेष खोजने का हुक्म सुनाया। इस मुद्दे को गर्माते हुए महारथी कूद पड़े। इनमें सबसे पहला नाम AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी का आता है।

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उन्होंने कोर्ट के फैसले पर तुरंत कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और मस्जिद कमेटी को तुरंत इस पर अपील दायर करनी चाहिये और इस फैसले को सुधरवाना चाहिये। उन्होंने कहा कि एएसआई एक बार फिर से इतिहास दोहराएगी, जैसा उसने राम मंदिर के मामले में किया था।

इकबाल अंसारी ने किया स्वागत

वहीं बाबरी मस्जिद के मामले में पक्षकार रहे मोहम्मद इकबाल अंसारी ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इससे कई सालों से चल रहा मुकदमा हल हो जाएगा। इससे ये भी पता चल जाएगा कि वहां मंदिर था कि मस्जिद थी। उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि हिंदू और मुस्लिमों में आपसी सौहार्द बना रहे।

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