gandhi गांधीवादी विचारधारा आज भी प्रासंगिक : विनोद शंकर चौबे

लखनऊ। उत्तर प्रदेश गांधी स्मारक निधि के तत्वावधान में शुक्रवारी को गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। जिसका विषय था गांधी दृष्टि में राष्‍टृीयता की सुदृढ़ प्रवृत्ति स्‍वतंत्र भारत की आधारभूत आवश्‍यकता है।

इस मौके पर वक्तव्य देते हुए गांधी चिंतन के जानकार पूर्व आईएएस विनोद शंकर चौबे ने कहा कि वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा को स्वार्थवश आहत किया जा रहा है। विधानसभा निर्वाचन में पश्चिमी बंगाल में बंगाल की अस्मिता को भारत की अस्मिता से पृथक करने जैसे वक्तव्य वहां के मुख्य कार्यकारी पदधारिका द्वारा दिए जा रहे हैं।

ये बयान वहां की जनता को,  युवाओं को हिंसा व तोड़फोड़ की ओर ले जा रहे हैं। अनुच्छेद 370 और 35-ए के हटने से कश्मीर समस्या का समाधान पूर्णता के निकट गया है। लेकिन, नक्सल-माओवाद के मार्ग-भ्रष्ट समूहों  द्वारा आंध्र,  झारखंड,  छत्तीसगढ़,  आदि क्षेत्रों में राष्ट्र विरोधी गतिविधियां भारतीय एकता अखंडता एवं संप्रभुता के प्रतिकूल हो रही हैं।

उन्‍होंने कहा कि कुछ दिन पहले ही शनिवार को बीजापुर हमले में नक्सलियों ने 23 सुरक्षा बल के जवानों की घात लगाकर हमला कर हत्या की थी और एक जवान को बंदी बनाया था। जिसे बाद में छोड़ दिया गया। किसान आंदोलन के नाम पर भी कुछ मार्ग- भ्रष्ट भारत विरोधी तत्व राष्ट्रीय एकता पर प्रहार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता संग्राम मैं पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले महात्मा गांधी का मार्गदर्शन अत्यंत प्रासंगिक है।

विनोद शंकर चौबे ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय गांधी ने संबंधित सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर सेन को पूरी क्षमता से पाकिस्तानी कबायली हमले को विफल कर कश्मीर की रक्षा का आग्रह किया था।

भारत के प्रति प्रेम एवं उसकी एकता के प्रति समर्पित गांधी ने असहयोग आंदोलन (1920-22) मे  ही भारत जन को उर्जाहीन बनाने,  उनकी आर्थिकता, आध्यात्मिकता,  सौमनस्य,  संस्कृति को विनष्ट करने के अंग्रेजों के प्रयास को चुनौती दी थी।

बंगाल के 1905 के बंग भंग आंदोलन की आत्मा स्वदेशी को उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम व समाजार्थिक उत्कर्ष की  आधारशिला ही बना दी। ‘वंदेमातरम’ को राष्ट्र की प्रथम वरीयता का नारा बंगाल की बौद्धिक व भावनात्मक उत्कृष्टता को सम्मान देने के लिए बनाया।

राष्ट्र की एकता के लिए ही हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए खिलाफत आंदोलन, विश्व के इतिहास में मानवता के प्रति अन्यतम अपराध जलियांवाला बाग की हिंसा में दोषियों को दंड, स्वराज,  अछूतोद्धार,  विचारों को व्यक्त करने की संगति (एसोसिएशन) गठित करने की व प्रेस की स्वतंत्रता को आंदोलन का प्रमुख तत्व बनाया।

गांधी ने कहा कि मेरा जीवन हिंदुत्व के मूल अहिंसा-धर्म के माध्यम से भारत की सेवा करने के लिए समर्पित है। सत्य,  अहिंसा, सत्याग्रह,  भारत की आत्मा है, जिसे महात्मा ने सीमित व्यक्तिगत दायरों से निकालकर जन जन का आंदोलन बना दिया।

गांधी पीड़क के प्रति दुर्भावना, हिंसक प्रतिरोध का त्याग कर, पीड़ा सह कर, पीड़क को न्यायोचित  व्यवहार के लिए आकर्षित करने के प्रेरक थे। असहयोग आंदोलन ही स्वतंत्रता प्राप्ति व  सामाजार्थिक न्याय पाने की गांधी द्वारा डाली गई सुदृढ़ नींव थी।

श्री चौबे ने कहा कि असहयोग आंदोलन का ही प्रभाव था कि तत्काल राष्ट्र को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई लेकिन भारत का मस्तिष्क और उसकी संचेतना श्रृंखलाओं को छिन्न-भिन्न कर स्वतंत्र हुई।

महात्मा गांधी भारत को आत्मनिर्भर, पूरे विश्व के विरुद्ध भी अपनी सुरक्षा हेतु सक्षम राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। इसी तरह कोरोना महामारी को निष्फल करने के लिए पूरे राष्ट्र को एक होकर इससे बचने एवं उपचारों के प्रति समर्पित होना चाहिए।

इस अवसर पर राजनीति की काजल की कोठरी से बेदाग निकल आने वाले गांधी चिंतन के प्रति समर्पित आदरणीय भगवती सिंह जी का देहावसान कुछ दिन पूर्व हो गया उन्हें गोष्ठी में हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की गई। गोष्ठी को नीलम भाकुनी,  आशुतोष निगम,  के.पी. मिश्रा,  के.डी. सिंह,  अर्जुन सिंह,  धनंजय राय, ओसामा एवं गांधी भवन के प्रबंधकों ने भी संबोधित किया।

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