January 25, 2022 11:13 am
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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: राष्ट्र निर्माण के नायक

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लखनऊ। स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ के पूर्व कार्यक्रमों के बीच स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्र नायकों का पुण्य स्मरण आवश्यक है। राष्ट्र निर्माण के व्यापक लक्ष्य हेतु प्राणोत्सर्ग करने वाले महापुरुष भारतीय जनमानस के लिए प्रेरणा पुंज बन जाते हैं। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राजनेताओं में से हैं। 6 जुलाई 1909 ( विक्रम संवत 1958 ,श्रावण मास,कृष्ण पक्ष पंचमी ,दिन शनिवार ) को यशस्वी माता-पिता श्रीमती योगमाया देवी एवं श्री आशुतोष मुखर्जी के पुत्र के रुप में जन्मे डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी को वंश परंपरा से आध्यात्मिक और अकादमिक अभिरुचि के संस्कार प्राप्त थे। दादा गंगा प्रसाद मुखर्जी के साहित्यिक गुणों व पिता सर आशुतोष मुखर्जी के अकादमिक गुणों का श्यामा प्रसाद में अद्भुत समन्वय था।

ल1917  में मैट्रिक से 1923  में एमए (बांग्ला भाषा) तक की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1924 में वकालत की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और कुछ दिन कलकत्ता उच्च  न्यायालय में वकालत भी की। 1934-38 के अवधि में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा (33 वर्ष की अवस्था) और सफल कुलपति होने का गौरव उन्होंने प्राप्त किया। इसके पहले 1929 व 1937 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए। 1939 में विनायक दामोदर सावरकर की प्रेरणा से हिन्दू महासभा में शामिल हुए तथा 1941 से 1947 तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहते हुए हिन्दूओं को संगठित करने का बीड़ा उठाया। 1946  में डॉ. मुखर्जी संविधान सभा के सदस्य , 1947 से 1953 तक केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य रहते हुए हिन्दू हितों की अनदेखी के कारण नेहरू-लियाक़त समझौते के विरोध में  मंत्रिमंडल से 8 अप्रैल 1950 को त्यागपत्र दे दिया।

20वीं शताब्दी का आरम्भ भारत की राजनीति का वह दौर था जिसमें राजनीतिक पराधीनता के साथ वैचारिक अंतर्विरोध और सांस्कृतिक संकट के लक्षण परिलक्षित हो रहे थे। सारे देश में साम्राज्यवाद के खिलाफ एक तीव्र लहर चल रही थी। बंगाल,जो भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक चेतना का मुख्य केंद्र रहा था, के विभाजन की कुटिल ब्रिटिश नीति ने राष्ट्रवाद की धारा को मंद करने के स्थान पर और तीव्र कर दिया था। किन्तु ब्रिटिश शासन के विखंडन वादी नीतियों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिक विभ्रमों के साथ मुस्लिम लीग के दुष्प्रचार से देश में सांप्रदायिकता के उदय और प्रसार को प्रश्रय दिया। स्वाधीनता संघर्ष की परिणति भारत की आजादी थी ,किंतु विभाजन की त्रासदी ने देश को गहरी वेदना दी।

स्वतंत्रता का आगमन भारत के लिए जहां नव निर्माण का दौर था, वहीं वैचारिक भ्रान्ति के विकास का भी दौर था। नव-स्वाधीन देश के सामने एक वैचारिक चुनौती मुस्लिम तुष्टीकरण,इसाई मिशनरियों के धर्मांतरण अभियान के साथ समाजवादी-साम्यवादी शक्तियों के ‘प्रगतिवाद’ से भी उत्पन्न हुई, जो हिंदू जीवन दृष्टि की मूल मान्यताओं को दुर्बल करने वाली थी। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी इन बहुविध राजनीतिक सामरिक चुनौतियों से भली प्रकार से परिचित थे यही कारण था जब वे भारतीय जनसंघ की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे तब इन कारको का संदर्भ भी उनके मस्तिष्क में विद्यमान था। जन संघ के घोषणापत्र को तैयार करते समय,प्रोफेसर बलराज मधोक जैसे वरिष्ठ सहयोगियों से उन्होंने हिन्दू हितों की अनदेखी,मुस्लिम तुष्टीकरण,धर्मान्तरण व राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौतियों के बीच,कृषि के उत्थान,नवीन उद्योगों की स्थापना,शैक्षिक सुधार,शोध और अनुसंधान के नवीन केन्द्र,सांस्कृतिक संवर्धन व सशक्त विदेश नीति जैसे विषयों पर बृहद व गंभीर चर्चा की थी।सामान्य रूप से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भारत की अखंडता के लिए जम्मू कश्मीर के पूर्ण विलय के प्रश्न पर  किए गए आंदोलन में 23 जून 1853 को अपने जीवन बलिदान के लिए याद किया जाता है लेकिन डॉ.मुखर्जी का व्यक्तित्व इतने तक ही सीमित नहीं है बल्कि स्वतंत्रता से पूर्व और बाद के भारत के नवनिर्माण में उनके योगदान की ऐतिहासिक श्रृंखलाएं हैं।

1937 के बंगाल विधानसभा चुनावों में मुस्लिम लीग की सुहरावर्दी सरकार प्रायोजित दंगो में  हिन्दू महिलाओं और बच्चों पर भीषण अत्याचार हुए तब डॉ. मुखर्जी ने अपनी सूझबूझ व राजनैतिक कौशल से मुस्लिम लीग को सत्ताच्युत कर कृषक प्रजा पार्टी के नेता फजलुलहक के नेतृत्व में गठित की तथा सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए बंगाल को एक हद तक  साम्प्रदायिक दंगो,कुशासन व प्राकृतिक आपदाओं से संरक्षण प्रदान किया।

जब मुस्लिम लीग के षडयंत्रों के आगे स्वाधीनता आन्दोलन के नेताओं ने देश विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय को स्वीकार कर लिया तब डॉ. मुखर्जी के प्रयासों से ही बंगाल, असम व पंजाब के हिन्दू बहुल क्षेत्रों को पाकिस्तान में जाने से बचाया। महात्मा गाँधी की सलाह और स्वातंत्र्यवीर सावरकर की प्रेरणा से प्रधानमंत्री नेहरु के आग्रह पर उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमण्डल में दायित्व स्वीकार कर लिया।

मंत्रिमंडल में शामिल होने के कुछ माह बाद ही उन्हें पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों की खबरें प्राप्त हुयी।उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत सरकार और भारतीय लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वह पूर्वी बंगाल के अल्पसंख्यक हिन्दुओं के हितों की सुरक्षा करें। इसके दो माह बाद ही 1948 के भीषण दंगो में हिन्दुओं की निर्मम हत्याएं व लूटपाट व आगजनी की घटनाओं से डॉ.मुखर्जी को भारी आघात पहुँचा। जब प्रधानमंत्री नेहरु ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लिकायत अली को भारत में मुस्लिमों की समस्याओं के संदर्भ में बुलाने का प्रस्ताव पारित रखा तो डॉ. मुखर्जी ने नेहरु-लियाकत वार्ता के विरोध में 8 अप्रैल 1950 को मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

डॉक्टर मुखर्जी ने यह महसूस किया कि संसद में केन्द्र सरकार की गलत नीतियों का मुखर विरोध करने वाले एक मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक है।महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश में बड़ा राजनीतिक बदलाव ला दिया था,हिन्दू महासभा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिन्दू हितकारी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर से भेंट कर एक नवीन दल के संगठन में सहायता मांगी।संघ प्रमुख श्री गुरु जी ने पं दीन दयाल उपाध्याय व अटल बिहारी बाजपेई सहित कई संगठन कर्ताओं डॉ. मुखर्जी की सहायता करने का निर्देश दिया। 16 जनवरी 1951 को दिल्ली में एक बैठक आहूत की गयी।दल के घोषणापत्र व संविधान के लिए बनी उपसमिति ने इसी बैठक में प्रस्तावित दल का नाम “भारतीय जनसंघ”रखा। 21 अक्टूबर,1951 को(इसी दिन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद सरकार का गठन किया था) को दिल्ली में चार सौ प्रतिनिधियों के सम्मेलन में इस नवीन संगठन के अध्यक्ष के रुप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भारतीय जनसंघ का संस्थापक अध्यक्ष घोषित किया।

डॉ. मुखर्जी ने अपने देश के प्रथम केंद्रीय मंत्रिमण्डल के उद्योग व आपूर्ति मंत्री के रुप में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट फैक्ट्री (HAL), सिंदरी में उर्वरक कारखाना तथा रेल इंजन तथा डिब्बे बनाने के लिए चितरंजन लोकोमोटिव कारखानों की स्थापना करायी। 1948 में प्रस्तुत स्वाधीन भारत की प्रथम औद्योगिक नीति में आत्मनिर्भरता व स्वावलंबन पर जोर देते हुए उन्होंने इण्डस्ट्रियल फाइनेंस कारपोरेशन,आल इण्डिया हैण्डीक्राफ्ट बोर्ड,आल इण्डिया हैण्डलूम बोर्ड,खादी ग्रामोद्योग बोर्ड जैसे संस्थानों की स्थापना करायी। इस नीति से उन्होंने वस्त्र उद्योग के व्यापक विस्तार की योजना को मूर्त रूप दिया।उसी का यह प्रतिफल है की भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में आज वस्त्र उद्योग की सबसे बड़े उद्योगों में गिनती होती है।भिलाई और राउरकेला में कालांतर में स्थापित इस्पात संयंत्रो की पृष्ठभूमि भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मंत्रित्व काल में ही बनी।

देशी रियासतों के विलय के प्रश्न पर वह सरदार पटेल के दृष्टिकोण के समर्थक थे।जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के विरुद्ध तो वह थे ही,किन्तु हैदराबाद,और जूनागढ़ राज्यों के भारतीय संघ में विलय की बाधाओं को दूर कराने में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठकों में डॉ. मुखर्जी,सरदार पटेल का दृढ़ता के साथ समर्थन व सहयोग करते थे। डॉ. साहब इस बात से बहुत व्यथित थे कि देश के नागरिकों को अपने ही देश के एक राज्य में जाने के लिए अनुमति-पत्र लेना पड़ता है। इसीलिए जब देश के दो प्रमुख सांसदो श्री उमाशंकर त्रिवेदी तथा विष्णु घनश्याम देशपाण्डे को बिना परमिट के प्रवेश की अनुमति न देकर गिरफ्तार कर लिया गया तो डॉ. मुखर्जी ने इसे देश के नागरिकों का स्वदेश में अपमान मानकर बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का फैसला किया। 8 मई 1953 को दिल्ली से पंजाब के रास्ते जम्मू में प्रवेश करते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 12 मई को उन्हें श्रीनगर के निशातबाग बंगले में नजरबन्द कर दिया गया। 22 जून को उन्हें असहज महसूस हुआ तथा 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थियों में उनका देहांत हो गया। उनकी अचानक मृत्यु के समाचार से देश स्तब्ध रह गया।उनकी मृत्यु ने देश मे हलचल मचा दी।नेहरु ने परिस्थियों को देखते हुए शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कराकर परमिट व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

भारतीय भाषाओं के संपोषक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी क्षेत्रीय भाषाओं के बृहद शब्दकोष के निर्माण से भाषायी एकीकरण की दिशा में प्रयासरत थे। मातृभाषा बांग्ला के प्रति मुखर्जी परिवार की आत्मीयता वरेण्य है। डॉ. श्यामा प्रसाद के बी.ए.अंग्रेजी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के बावजूद अपने पिता सर आशुतोष मुखर्जी की इच्छा पर उन्होंने बांग्ला भाषा में एम.ए.किया और विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। डॉ.मुखर्जी द्वारा विज्ञान की शिक्षा बांग्ला में उपलब्ध कराने के लिए वैज्ञानिक शब्दावली का संकलन कराया गया।कलकत्ता विश्वविद्यालय में डॉ. मुखर्जी की पहल पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा पहली बार 1937 में प्रथम दीक्षांत भाषण मातृभाषा बांग्ला में हुआ। वस्तुतः चाहे हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की मुहिम रही हो या उर्दू,हिन्दी और बांग्ला जैसी भारतीय भाषाओं के बी.ए.पाठ्यक्रमों को कलकत्ता विश्वविद्यालय में आरम्भ करवाने का निर्णय, डॉ. मुखर्जी का औपनिवेशिक भाषातंत्र के स्थान पर भारतीय भाषाओं की संवृद्धि व विकास में अभूतपूर्व योगदान था। देश की नामचीन वैज्ञानिक संस्थाओं की प्रशासनिक समितियों में रहकर उनके संवर्धन के अनेक प्रयास उनके द्वारा किए गये। 1935 में वे भारतीय वैज्ञानिक संस्थान,बेंगलुरु के कोर्ट व परिषद् के सदस्य रहे।इस दौरान उन्होंने सी.वी. रमन व जे.सी.घोष जैसे श्रेष्ठ  वैज्ञानिकों को संस्थान में मनोयोग व स्वायत्तता के साथ अनुसंधान कार्य करने का वातावरण उपलब्ध करवाया।अपने पिता द्वारा स्थापित ‘यूनिवर्सिटीज  कालेज आफ साइंस’ का विकास का प्रयास  रहा हो या इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स 1950 (साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स,1956) स्थापना व इसके कार्यकारी परिषद में रहकर संस्थान की उन्नति का प्रयास रहा हो, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत में वैज्ञानिक विकास की आधारशिला रखने मे अभूतपूर्व योगदान दिया है।

डॉ. मुखर्जी पर साम्प्रदायिक,रुढ़िवादी, कट्टर हिन्दू आदि  होने के आरोप लगाएं जाते हैं,जो सही नहीं है। वस्तुतः वह सभी धर्मों,जातियों व मतों का समादर करने वाले उत्कृष्ट बुद्धिजीवी व राजनेता थे। उन्होंने प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार नजरूल इस्लाम को उनके आर्थिक संकट के समय न केवल उनकी मदत की बल्कि अस्वस्थ होने पर कुछ दिन अपने घर पर उनकी चिकित्सा व देखभाल करके स्वस्थ होने पर उनके घर भेजा। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी व साहित्यकार नजरूल इस्लाम का बंगाली भाषा में मित्रतापूर्ण पत्राचार आज भी बंगाली साहित्य की धरोहर है। महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष रहते पूर्वोत्तर के देशों में बुद्ध के अवशेषों की यात्रा द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संबंधो सुधारने में भी उन्होंने भूमिका निभायी। वस्तुतः डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के उन प्रमुख राष्ट्र नायकों मे से हैं जिनके योगदान की अनदेखी होती रही है। आज जब भारतीय जनसंघ की उत्तराधिकारी भाजपा की उत्तर से दक्षिण तक राज्यों में और लगातार दूसरे कार्यकाल में केन्द्र में सरकार शासन कर रही है तब उम्मीद है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके शैक्षिक,राजनीतिक वैज्ञानिक योगदान से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के अभियान को आगे बढाएगें।जम्मू-कश्मीर मुद्दे के समाधान की दिशा में लिये गए संकल्पपूर्ण निर्णय से राष्ट्रजनों की आकांक्षाओं को बल मिला है। उनके द्वारा उठाए गए अन्य मुद्दों का भी सार्थक व समयबद्ध समाधान हो सकेगा, तभी डॉ. श्यामा प्रसाद के वैचारिक प्रतिष्ठान को आगे बढ़ाया जा सकेगा।

 

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लेखक- डॉ. कुलवीर सिंह चौहान
लेखक- डॉ. कुलवीर सिंह चौहान, राजनीतिशास्त्री हैं, लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधार्थी रहे हैं।

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