January 18, 2022 7:53 am
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Utpanna Ekadashi 2021: 30 नवंबर को रखा जाएगा उत्पन्ना एकादशी का व्रत, जानें व्रत का महत्व और पूजा विधि

उत्पन्ना एकादशी Utpanna Ekadashi 2021: 30 नवंबर को रखा जाएगा उत्पन्ना एकादशी का व्रत, जानें व्रत का महत्व और पूजा विधि

Utpanna Ekadashi 2021 || हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक मास में आने वाली एकादशी का महत्व माना जाता है। जिसका सभी की जीवनी पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। और इस बार ज्योतिष पंचांग के अनुसार 30 नवंबर को उत्पन्ना एकादशी व्रत किया जाएगा। मान्यताओं के अनुसार उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) का खास महत्व माना जाता है। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली इस उत्पन्ना एकादशी को सभी पापों से मुक्त कराने वाली एकादशी के नाम से जाना जाता है। वहीं इस दिन विधि पूर्वक व्रत और पूजा करने से सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ण होती है। उत्पन्ना एकादशी के दिन ही एकादशी माता का जन्म हुआ था इसलिए इसे उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। इसी एकादशी से साल भर के एकादशी व्रत की शुरुआत की जाती है। इसके साथ ही उत्पन्ना एकादशी के दिन भगवान विष्णु के लिए व्रत रखकर उनकी पूजा की जाती है।

उत्पन्ना एकादशी का महत्व

उत्पन्ना एकादशी का काफी अधिक महत्व माना जाता है मान्यताओं के अनुसार यह दिन एकादशी उपवास की उत्पत्ति का प्रतीक है। कहा जाता है कि इस दिन देवी एकादशी का जन्म हुआ था इसीलिए इस उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। दीदी एकादशी की उत्पत्ति राक्षस मूर वध करने के लिए हुई थी। जो भगवान विष्णु को मरने का इरादा रखते थे। दीदी एकादशी को भगवान विष्णु की शक्ति माना जाता है यह भगवान विष्णु की रक्षात्मक शक्तियों का एक रूप है। और जो भक्त वार्षिक एकादशी का व्रत रखना चाहते हैं व उत्पन्ना एकादशी से एकादशी व्रत की शुरुआत करें।

पूजा विधि

उत्पन्ना एकादशी के दिन भगवान विष्णु के लिए व्रत रखकर उनकी पूजा की जाती है। एकादशी तिथि पर प्रात: काल उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा आरंभ करें। इस दिन शाम को भी भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। शाम की पूजा में मा लक्ष्मी जी की भी पूजा करें और मुख्य दरवाजे पर घी का दीपक जलाएं। ऐसा करने से लक्ष्मी जी का भी आर्शीवाद प्राप्त होता है। इस दिन दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जरूरतमंदों को दान देना चाहिए। यह व्रत दो प्रकार से रखा जाता है, निर्जला और फलाहारी या जलीय व्रत। सामान्यतः निर्जल व्रत पूर्ण रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति को ही रखना चाहिए। अन्य या सामान्य लोगों को फलाहारी या जलीय उपवास रखना चाहिए। दिन की शुरुआत भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर करें। अर्घ्य केवल हल्दी मिले हुए जल से ही दें। रोली या दूध का प्रयोग न करें। इस व्रत में दशमी को रात्री में भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी को प्रातः काल श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है।

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