December 8, 2021 11:20 am
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छठ महापर्व का तीसरा दिन आज, जानें सूर्यदेव को अर्घ्य देने का क्या है महत्व

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छठ महापर्व सनातन धर्म का ऐसा पर्व है। जिसने प्रत्यक्ष रूप से किसी देवता की पूजा की जाती है। कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाने वाला इस महापर्व में सूर्य देव की उपासना की जाती है। लगातार 4 दिन तक चलने वाली इस छठ महापर्व में व्रती महिलाएं 36 घंटे का निर्जला उपवास रखती है। छठ महापर्व के तीसरे दिन डूबते सूर्य देवता को अर्घ्य देती हैं वही अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी व्रत का समापन करती है।

छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है

क्यों दिया जाता है डूबते सूरज को अर्घ्य

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शाम के वक्त सूर्य देवता अपनी अर्धांगिनी देवी प्रत्युषा के साथ समय बिताते हैं। यही कारण है कि छठ महापर्व की तीसरे दिन डूबते सूरज को अर्घ्य देते वक्त सूर्य देव के साथ देवी प्रत्युषा की भी उपासना की जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से व्रती महिला व पुरुष की सभी मनोकामनाएं जल्द पूरी हो जाती है। साथ ही एक मान्यता यह भी है कि डूबते सूरज को अर्घ्य देने से जीवन में आई सभी कठिनाइयों, स्वास्थ्य समस्याएं डूबते सूरज के साथ समाप्त हो जाती है।

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कब शुरू हुई ये परंपरा

पौराणिक मान्यताओं व कथाओं के अनुसार छठ मैया को ब्रह्मा की मानस पुत्री और भगवान सूर्य देव की बहन माना जाता है। लोगों का मानना है कि छठ मैया निसंतान को संतान की प्रप्ति करती है और संतान की लंबी आयु के लिए पूजे जाने वाले पावन व्रत है। एक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा की गर्भ में पल रहे शिशु का वध कर दिया गया था तब उस शिशु को बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा को कार्तिक मास षष्टी के व्रत करने की सलाह दी थी।

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उगते सूरज को अर्घ्य देकर होता है व्रत का पारण

लगातार 4 दिन तक चलने वाले छठ महापर्व का पारण चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्य देकर किया जाता है। 36 घंटे के निर्जला उपवास विधि विधान के साथ भगवान सूर्य देव की उपासना करने के बाद व्रती महिलाएं अपने व्रत को समाप्त करती है। इस दिन छठ घाट पर काफी अधिक रौनक देखने को मिलती है। साथ में छठ मैया के प्रसार को लेने के लिए हर घाट पर काफी अधिक मात्रा में भीड़ देखने को मिलती है।

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छठ महापर्व से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लगातार चार दिनों तक चलने वाली इस छठ महापर्व कठिन तपस्या के रूप में देखा जाता है। मुख्य तौर पर इस व्रत को महिलाएं करती हैं लेकिन कुछ परिस्थितियों में पुरुष भी इस को करते हुए दिखाई देते हैं। छठ महापर्व के महत्व की बात करी थी इसको लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं मान्यता के अनुसार राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में राम राज्य की स्थापना के लिए भगवान राम और मैया सीता ने कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर प्रत्यक्ष रूप से भगवान सूर्य देव की आराधना की थी और अगले दिन सप्तमी तिथि को सूर्य देव ने उन्हें दर्शन देकर रामराज स्थापित होने का आशीर्वाद दिया कहा जाता है तभी से कार्तिक माह की छठी तिथि को छठ पर मनाया जाता है। 

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वहीं कुछ अन्य मान्यताओं के अनुसार राजा प्रियवद की कोई संतान नहीं थी तब उनके आग्रह पर महर्षि कश्यप ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करानी और उनकी पत्नी को यज्ञ में आहुति देने के लिए खीर बनाने का निर्देश दे। यज्ञ के पूरा होने की बाद इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। इसके बाद राजा प्रियवद अपने पुत्र को लेकर शमशान गए और वहां विलाप करने लगे। उनके विलाप को सुनकर वह उस वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई। और उन्होंने कहा कि एसएसटी की मूल प्रवृत्ति की छठी अंशु मुझे षष्टि कहा जाता है। राजन तुम मेरा व्रत करो निश्चित ही तुम्हारी पुत्र इच्छा मां षष्टि के व्रत से पूरी होगी। साथ ही लोगों को भी इस व्रत के लिए प्रेरित करो।

 

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