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21 साल के उत्तराखंड में, 12 मुख्यमंत्री, क्या अभिशप्त है मुख्यमंत्री का सरकारी बंगला?

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नई दिल्ली। उत्तराखंड में एक बार फिर इतिहास को दोहराया गया है। 21 बरस के उत्तराखंड में अब तक 12 मुख्यमंत्री कुर्सी बदल चुके हैं। इस बार कयास लगाए जा रहे थे कि शायद त्रिवेंद्र सिंह रावत इस मिठक को तोड़ नया रिकॉर्ड बनाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

क्या अभिशप्त है बंगला?

अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री का सरकारी बंगला अभिशप्त है या फिर सूबे की मुखिया की किस्मत में बगावत की कहानी लिखी है। 21 सालों में अब तक जो भी मुख्यमंत्री बना, वो अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं कर पाया । कार्यकाल पूरा होने से पहले ही “पूर्व” हो गया।

SARKARI BANGLA 21 साल के उत्तराखंड में, 12 मुख्यमंत्री, क्या अभिशप्त है मुख्यमंत्री का सरकारी बंगला?

एनडी तिवारी हैं अपवाद

उत्तराखंड के इतिहास में कांग्रेस के दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी ही एक ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने साल 2002 से 2007 तक अपना कार्यकाल जैसे-तैसे पूरा किया था। लेकिन जब वो मुख्यमंत्री बने, तब तक देहरादून में मुख्यमंत्री के लिए स्थायी सरकारी आवास नहीं बन पाया था, लिहाजा बीजापुर गेस्ट हाउस में ही अस्थायी आवास बनाया गयाय था।

साल 2000 में उत्तराखंड समेत तीन राज्यों का गठन किया गया था। तब नित्यानंद स्वामी की अगुवाई में बीजेपी की अंतरिम सरकार ने सूबे की कमान संभाली थी। 2002 में कांग्रेस को जनता ने अपना सिरमौर बनाया और तब तिवारी मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद बीजेपी के बीएस खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी, रमेश पोखरियाल निशंक से लेकर अब त्रिवेंद्र सिंह रावत तक कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। कांग्रेस से विजय बहुगुणा और हरीश रावत भी पांच साल तक कुर्सी पर नहीं रह पाये।

हर पार्टी में बागियों की भरमार

सियासी बगावत के मामले उत्तराखंड अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा देखे जाते हैं। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही इस बगावत का दंश झेला है। कांग्रेस से बगावत करके बीजेपी में विधायक पार्टी के पुराने नेताओं पर भारी पड़ रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि पार्टी आलाकमान को आज रावत की बलि लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। क्योंकि विधानसभा चुनाव में पार्टी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती है।

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