ब्रज की होली में अब नहीं दिखते चोबा, अगरू और अरगजा, टेसू के फूल भी हुए गायब

वृंदावन। भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में ब्रज की होली लोकप्रिय है। ब्रज वो क्षेत्र है जहां भगवान श्रीकृष्ण का बचपन बीता था। इसी इलाके में उन्होंने गोपियों संग रास लीला की है और बाल लीला के दर्शन करवाए हैं। लेकिन इस बार होली का रंग काफी अलग है।

चोबा, अगरू, अरगजा और कुमकुमा हुए गायब

अब गुलाल तो उड़ रहा है, अबीर भी महक रहा है, लेकिन इस पर परंपरा का अभाव देखने को मिल रहा है। इस बार मंदिरों में पद और पदावलियों का रंग तो देखने को मिल रहा है लेकिन चोबा, अगरू, अरगजा और कुमकुमा के रंग ढूंढे नहीं मिल रहे हैं।

ब्रज की होली में अब नहीं दिखते चोबा, अगरू और अरगजा, टेसू के फूल भी हुए गायब

ब्रज में होली पर पांच सौ साल से गाते आ रहे लोकगायक अब भी गा बजा रहे हैं, लेकिन अब टेसू के फूल तक दिखना बंद हो गए हैं। टेसू के फूलों का प्रयोग मात्र कुछ प्राचीन मंदिरों में ही किया जा रहा है।

बहुत कम खेली जाती है टेसू के फूल से होली

दरअसल ब्रज में ठाकुर जी के साथ खेली जाने वाली होली में चोबा, अगरू अरगजा और कुमकुमा के साथ टेसू के फूलों का खूब इस्तेमाल किया जाता है। ये फूल परंपरा का हिस्सा थे इसलिए परंपरागत रूप से भी इन फूलों का खूब महत्व था।

ब्रज की होली में अब नहीं दिखते चोबा, अगरू और अरगजा, टेसू के फूल भी हुए गायब

धीरे-धीरे इनकी खेती खत्म होती गई और ये फूल परिदृश्य से गायब हो गए। अब सिर्फ कुछ एक मंदिरों में ही टेसू के फूल से होली खेली जाती है, नहीं तो इसका भी प्रयोग अब बंद हो गया है।

लोग कैमिकल युक्त रंगों का कर रहे इस्तेमाल

अब होली पर लोग कैमिकल युक्त रंगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे शरीर को विभिन्न परेशानियों से भी दो चार होना पड़ रहा है। बता दें कि ब्रजक्षेत्र में होली का रंग अद्भुत होता है। 40 दिन पहले से ही होली की रौनक शुरू हो जाती है और विभिन्न परंपराओं को निभाते हुए यहां अनेकों किस्म से होली खेली जाती है।

चोबा, अरगजा को बनाने में लगता है समय

असल में इन फूलों से रंग बनाने में अत्यधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ये बात अबुल फजल की एक रचना आईने अकबरी से भी मिलती है।

ब्रज की होली में अब नहीं दिखते चोबा, अगरू और अरगजा, टेसू के फूल भी हुए गायब

उन्होंने अपनी रचना में इसे बनाने की विधि का भी वर्णन किया था। जिससे आने वाली पीढ़ी को भी इसकी जानकारी मिलती रहे। उन्होंने अपनी रचना में लिखा था कि चोबा बनाने के लिए करीब एक सफ्ताह का समय लगता है। इसको बनाने की प्रक्रिया बेहद जटिल है। वहीं अरगजा को बनाने के लिए मेद, चोबा, बनफशा, गेहला, गुलाब और चंदन का इस्तेमाल होता है।

युवा पीढ़ी के पास नहीं है टाइम

मथुरा के स्थानीय बुजुर्ग लोग बताते हैं कि अब दौर बदल गया है। आज की पीढ़ी शार्ट कट तरीके से हर चीज हासिल करना चाहती है, इसलिये ये प्राकृतिक रंग हमारी आंखों से ओझल हो गए हैं। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के पास इन सब परंपराओं को निभाने के लिए टाइम ही नहीं है।

 

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