धूमधाम से मना देहरादून का झंडा मेला

देहरादून। सिक्ख धर्म के सातवें गुरू हरराय के ज्येष्ठ पुत्र का आगम साल 1675 में चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन दून की धरती पर हुआ था । दून की इसी धरती पर दरबार साहिब गुरू रामराय के आंगन में साझा चूल्हे की नींव डाली गई थी। यहीं से देहरादून का ऐतिहासिक झंडा मेला शुरू हो जाता है। जो प्रत्येक वर्ष रामराय की याद में मनाया जाता है। इस मेले को लेकर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष से लोग आते हैं। वर्तमान में ये मेला दून की संस्कृति में रचा बसा हुआ है।

जब रामराय के कदम देहरादून पर पड़े तो यह एक छोटा सा गांव हुआ करता था। रामराय ने यहां आने वाले और मेले में शामिल होने वाले लोगों के लिए भोजन का इंतजाम शुरू किया। लेकिन मेले में आने वाले की संख्या के हिसाब से ये व्यवस्था आसान ना थी, लिहाजा गुरू रामराय महाराज ने एक ऐसी व्यवस्था बना जिसे साझा चूल्हा का नाम दिया। उनका कहना था कि उनके दरबार से कोई व्यक्ति भूखा वापस ना जा सके। कहा जाता है कि गुरू की कृपा से आज तक इस चूल्हे का आंच ठंडी नहीं पड़ी है।

दरबार की चौखट पर आए किसी व्यक्ति से उसका मजहब नहीं पूछा जाता और दरबार साहिब में हर मजहब के लोग शीश झुकाते हैं। गुरू ने भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से ही साझा चूल्हे की विरासत यहां पर दी है। आज भी यहां पर लोग हजारों की संख्या में रोजाना भोजन ग्रहण करते हैं। लेकिन इस खास दिन पर यहां पर आने वाले लोगों की तादाद हजारों हजार हो जाती है। इस कारण से इस जगह से कई स्थानों पर लंगर की व्यवस्था की जाती है। इस होने वाले सभी आयोजनों की पूरी व्यवस्था दरबार साहिब की ओर से होती है।