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अलविदा 2017: साल के अंत में जमकर गहराया येरूशलम का मु्द्दा

WhatsApp Image 2017 12 27 at 3.34.20 PM अलविदा 2017: साल के अंत में जमकर गहराया येरूशलम का मु्द्दा

नई दिल्ली। उथल-पुथल भरे रहे इस साल के अंत में अमेरिका ने एक ऐसा बड़ा फैसला ले लिया, जिसके बाद ये साल जाते-जाते अगले साल तक के लिए एक विवाद दे गया। दरअसल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान किए अपने वादों को पूरा तो कर रहे हैं, लेकिन उनके ये फैसले दुनिया के लिए सिरदर्द बन गए हैं। दरअसल दिसंबर में उन्होंने सालों से अटके येरूशलम विवाद को सुलझाने के लिए येरूशल को इजराइल को सौंप दिया और उसे इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी। ट्रंप के इस फैसले का अरब देशों ने जोरदार विरोध किया और इसे मध्य एशिया में शांति भंग करने वाला फैसला करार दिया। इस फैसले को लेकर के बाद ट्रंप ने कहा था कि मैंने निर्धारित किया है कि येरूशलम को इजराइल के रूप में आधिकरिक पहचान मिले। इसी के  साथ उन्होंने विदेश मंत्रालय को जल्द से जल्द येरूशलम में अमेरिकी दूतावास स्थापित करने के आदेश भी दे दिए थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि आज हम अंत में स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि येरूशलम इजरायल की राजधानी है। ये एक वास्तविकता को पहचानने से ज्यादा और कम कुछ नहीं है। ट्रंप ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का समाधान निकालने के लिए दो-राज्य नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा था कि अमेरिकी शांति समझौता चाहता है और “येरूशलम में इजरायल की संप्रभुता या सीमाओं के समाधान की स्थिति” पर कोई फैसला नहीं लेगा।ट्रंप ने याद दिलाया कि साल 1995 में, कांग्रेस ने यरुशलम दूतावास अधिनियम को अपनाया, जिसमें अमेरिकी दूतावास को यरुशलम में स्थानांतरित करने और उस शहर को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के लिए संघीय सरकार से आग्रह किया गया था। उन्होंने कहा था ये अधिनियम एक भारी द्विदलीय बहुमत से कांग्रेस द्वारा पारित किया गया और केवल छह महीने पहले सीनेट में सर्वसम्मति वोट से दोबारा पुष्टि की गई।’ उन्होंने कहा कि येरूशलम सिर्फ तीन महान धर्मों का केंद्र नहीं है, बल्कि यह दुनिया में सबसे सफल लोकतंत्रों में से एक है।WhatsApp Image 2017 12 27 at 3.34.20 PM अलविदा 2017: साल के अंत में जमकर गहराया येरूशलम का मु्द्दा

वहीं दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने येरूशलम पर इज़राइल के कब्जे को अवैध मानता है और अधिकांश देशों के दूतावास में उनके पास है तेल अवीव में है। इस मुद्दे को घराते हुए देर नहीं लगी और अरब समेत यूरोप के देशों के विरोध को लेकर अमेरिका ने उन्हें चेतावनी तक दे डाली। इस मुद्दे को जब संयुक्त राष्ट्र के मंच पर उठाया गया तो इसको लेकर यूएन ने वोटिंग करवाने का फैसला लिया, जिसमें लगभग सभी देशों ने हिस्सा लिया। फैसले को अपने पक्ष में करने के लिए ट्रंप ने सीधे तौर पर दुनिया के सभी देशों को धमकी देते हुए कहा कि अगर किसी ने भी उसके खिलाफ मतदान किया तो वो उसकी आर्थिक सहायता को रोक देगा। अमेरिका की इस धोख के आगे कोई देश नहीं झुका और ज्यादातर देशों ने अमेरिकी के खिलाफ मतदान किया, जिनमें से एक भारत भी था।

कुल 128 देशों ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन किया। 9 देशों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ में वोट दिया और 3 देशों ने अपने आप को इससे अलग रखा और इसकी वजह थी ट्रंप की देशों को दी हुई धमकी।भले ही वैश्विक मंच पर इस मसले को लेकर अमेरिका अलग-थलग पड़ गया, मगर उसके पश्चिमी और अरब देशों के सहयोगी देशों ने उसके पक्ष में मतदान कर अमेरिका को अकेला पड़ने से बचा लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी थी कि जो भी देश प्रस्ताव के पक्ष में वोट देंगे, उन्हें अमेरिका की तरफ से दी जाने वाली आर्थिक मदद में कटौती की जाएगी।जिन प्रमुख देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया उनमें आस्ट्रेलिया, भूटान, कनाडा, कोलंबिया, हंगरी, मैक्सिको, पनामा, फिलीपींस, पोलैंड और यूगांडा शामिल हैं।

हालांकि महासभा की बैठक में भारत ने इस मसले पर कुछ नहीं कहा, लेकिन ट्रंप द्वारा येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने के बाद भारत ने कहा था कि फलस्तीन पर उसकी स्थिति पहले की तरह और स्वतंत्र है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निकी हेली ने महासभा के प्रस्ताव की आलोचना की। हेली ने कहा था कि अमेरिका इस दिन को याद रखेगा जब एक संप्रभु देश के तौर पर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की वजह से संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस पर हमला हुआ। वहीं तुर्की राष्ट्रपति एर्दोआन ने ट्रंप की इस घोषणा को ‘मुस्लिमों के लिए खतरे की घंटी’ बताया, क्योंकि पूर्वी फिलस्तीनी क्षेत्र के नागरिक इसे अपने देश की भविष्य की राजधानी के तौर पर देखते हैं।

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