प्रयागराज: इस वृक्ष के दर्शन से मिलता है शनिदेव का आशीर्वाद, अद्भुत है महिमा

प्रयागराज: तीर्थनगरी प्रयागराज की पहचान केवल गंगा नदी से ही नहीं है, यहां पर लगने वाला कुंभ मेला और मठ-मंदिरों के अलावा प्राचीन वृक्ष भी यहां की पहचान हैं।

शमी वृक्ष की महिमा है अद्भुत

इन वृक्षों को यहां पर किसी देवता की तरह पूजा जाता है, और लोग भगवान की तरह इनको भी भोग लगाते हैं। इनकी आरती भी उतारी जाती है। इन्हीं पुरातन वृक्षों में जिले का गौरव कहा जाने वाला शमी का एक पेड़ है।

इस वटवृक्ष को लेकर मान्यता है कि जो भी इस पेड़ की पूजा करता है, उसे शनिदेव के कोप से मुक्ति मिलती है और उनका आशीर्वाद मिलता है। इससे व्यक्ति को धन-धान्य की भी प्राप्ति होती है। इस वृक्ष की इतनी मान्यता है कि इसके दर्शन के लिए जिले से दूर-दूर से लोग आते हैं।

दारागंज मोरी क्षेत्र में लगा है ‘दिव्य’ वृक्ष

जिले के दारागंज मोरी इलाके में लगा शमी का ये वृक्ष आस्था का केंद्र है। इस वृक्ष के पास ही भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा है और नागपुर के महाराजा के बनवाये गए पुरातन भवन के आंगन में ये पेड़ लगा हुआ है।

मुगल शासन भी नहीं काट पाए वृक्ष को

बताया जाता है कि मुगलों के शासनकाल में इस वृक्ष को काटने का कई बार प्रयास किया गया, लेकिन हर बार कोई न कोई ऐसी घटना हो गई, जिससे वटवृक्ष को काटने के फैसले को वापस लेना पड़ा। इससे लोगों में इस पेड़ को लेकर आस्था बढ़ गई। वहीं कई लोगों की इस वटवृक्ष ने मन्नतें भी पूरी की हैं।

आज आलम ये है कि इस वृक्ष की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है और सालभर यहां भक्त मन्नत मांगने आते रहते हैं। इस वृक्ष को बचाने के लिए कई संस्थाएं और स्थानीय लोग भी लगे हुए हैं।

पेड़ को बचाने के लिए चल रहा अभियान

मंदिर के पुजारी और महंत भी इस वृक्ष में आस्था रखते हैं और इसे बचाने के लिए अभियान चला रहे हैं। इस समय इस वृक्ष की देखभाल एक मराठी परिवार कर रहा है। वो ही यहां पर वृक्ष की पूजा-अर्चना करता है। इस वृक्ष को बचाने के लिए प्रयागराज के लोगों ने शासन और प्रशासन से अपील भी की है।

लोगों ने की शासन-प्रशासन से अपील

धर्मनगरी प्रयागराज के स्थानीय लोग कहते हैं कि जब पेड़ों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है, तो ये तो दिव्य वृक्ष है, इसमें परमात्मा का साक्षात निवास है। लोगों ने कहा कि शासन और प्रशासन को शमी के इस प्राचीन पेड़ को बचाने का प्रयास करना चाहिये और इसे विरासत की श्रेणी में रखकर इसका संरक्षण करना चाहिये।

 

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