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2007 के करिश्मे को दोहराएंगी मायावती? 70 जिलों के ये बड़े संगठन बसपा के संपर्क में!

mayawati 20100121 2007 के करिश्मे को दोहराएंगी मायावती? 70 जिलों के ये बड़े संगठन बसपा के संपर्क में!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में विधानसभा चुनाव (Up Assembly Election) की तैयारियां सभी दलों ने तेज कर दी है। ग्राउंड जमीन पर सत्ताधारी भाजपा (BJP) के मुकाबले सपा (SP) को दिखाया जा रहा है। जबकि, प्रदेश में चार बार सरकार बना चुकी बसपा (BSP) को तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी माना जा रहा है। इसके पीछे का कारण है बसपा के बड़े नेताओं का अलग होना। 2022 में राजनीतिक पंडित बसपा को यूपी की सियासत का कमजोर खिलाड़ी बताने में लगे हुए थे। लेकिन, क्या वाकई मायावती (Mayawati) इतनी कमजोर हैं। इसको लेकर एक बहस छिड़ गई है। कुछ महीने पहले राजनीतिक पटल से गायब दिख रही बसपा एक बार फिर से मीडिया में नजर आने लगी है। लेकिन, क्या ये यूं ही है। मायावती ने सोशल मीडिया (Social Media) पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है। इन सारे नजारों के बीच कयासों का दौर शुरू हो गया है। लेकिन सच क्या है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

अपने फेल फॉर्मूले से सबक लेगी बसपा

एक बड़े मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बसपा अपने 2007 के फॉर्मूले पर काम कर रही है। यानी दलित और ब्राह्मण का गठजोड़। इस बारे में जब भारत खबर ने पूर्वांचल (Purvanchal) से ताल्लुक रखने वाले एक कद्दावर बसपा नेता से बुधवार की देर शाम बात की तो उन्होंने इस बात की पुष्टि की। नाम नहीं छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि बसपा के वोटर को हमेशा से साइलेंट वोटर माना जाता रहा है।

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उन्होंने कहा कि आप 2007 के पहले के दौर पर नजर डालिए तो आपको याद होगा कि उस समय भी बसपा को गिना नहीं जा रहा था। लेकिन परिणाम सबके सामने था। हालांकि वह कहते हैं कि राह इस बार भी आसान नहीं है, लेकिन अपनी रणनीतियों में बदलाव किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि बसपा ने पिछले दो चुनाव दलित और मुसलमान के फॉर्मूले पर लड़ा और करारी हार देखने को मिली। इस बार एक बार फिर दलित और ब्राह्मण के गठजोड़ पर बसपा काम कर रही है इसका परिणाम भी देखने को मिलेगा।

70 जिलों के विभिन्न ब्राह्मण संगठनों से मायावती की हुई मुलाकात

बसपा नेता ने बताया कि मायावती (Mayawati) पिछले कई महीनों से लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं। वह यहीं से यूपी और पंजाब चुनाव के हालातों पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने बताया कि पिछले दो महीनों में यूपी के करीब 70 जिलों के विभिन्न ब्राह्मण संगठनों ने बसपा सुप्रीमो (BSP Chief) से मुलाकात की है। इस मुलाकात का सबसे मजेदार पहलू यह है कि इन संगठनों ने ही पहल की है। बसपा नेता के दावे के मुताबिक इन संगठनों ने साफ तौर पर कहा है कि बसपा सरकार में जिस तरह से ब्राह्मणों का सम्मान हुआ है, वैसा सम्मान न तो सपा (Samajwadi Party) में मिला और न ही भाजपा (Bharatiya Janta Party) में। हालांकि, इन संगठनों ने अपने लोगों के लिए टिकट की भी मांग की है।

कई संगठनों ने मांगा मायावती से मिलने का समय

सूत्रों के मुताबिक अभी भी बसपा प्रमुख से कई ब्राह्मण संगठनों ने मिलने का समय मांगा है। बसपा प्रमुख मायावती बिना किसी शोर शराबे के पंजाब (Punjab) और यूपी (UP) के पदाधिकारियों के साथ लगातार बैठकें कर रहीं हैं। साथ ही दोनों राज्यों में सत्ता की चाभी अपने पास रखने की कवायदों को अंतिम रूप देने में जुटी हुईं हैं।

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विकास दुबे के एनकाउंटर से नाराज है ब्राह्मण समुदाय

भाजपा (BJP) सरकार से ब्राह्मणों में खासी नाराजगी है। इसका सबसे बड़ा कारण है कानपुर (Kanpur) के विकास दुबे (Vikas Dubey) का एनकाउंटर। इसके अलावा कई ब्राह्मण गैंगस्टरों पर भी एनकाउंटर के कारण इस समुदाय की नाराजगी बढ़ती ही जा रही है। इतना ही नहीं विकास दुबे के परिवार से लगातार पूछताछ और उसके राइट हैंड रहे अमर दुबे (Amar Dubey) की पत्नी खुशी दुबे (Khushi Dubey) को जेल में डालने से ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग नाराज चल रहा है।

बसपा सरकार में 45 विधायक, 15 मंत्री, 15 एमएलसी थे ब्राह्मण समुदाय के

ब्राह्मणों का झुकाव बसपा की ओर इसलिए भी है कि जब 2007 में बसपा की सरकार बनी तो 207 विधायकों में 45 ब्राह्मम समाज के थे। सतीश चंद्र मिश्रा (Satish Chandra Mishra) ब्राह्मण नेताओं का सबसे बड़ा चेहरा थे। इतना ही नहीं मायावती की सरकार में 15 ब्राह्मण समुदाय के विधायकों को मंत्री बनाया गया था।

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इतना हीं नहीं जब एमएलसी (MLC) बनाने की बारी आई तो मायावती ने ब्राह्मण नेताओं को खूब तरजीह दी और 15 लोगों को एमएलसी बनाया। इतना ही नहीं विभिन्न निगमों, आयोगों में अध्यक्षों, सदस्यों का नॉमिनेशन भी ब्राह्मण वर्ग के ज्यादातर लोगों का किया गया था। यह वही दौर था जब बसपा पर दलितों की बजाय ब्राह्मणों की पार्टी होने का आरोप लगने लगा था। जो बाद में बसपा की टूट का कारण भी बना।

जिसके साथ आए ब्राह्मण, उसकी बनी सरकार

पिछले कई चुनावों पर नजर डालें तो जिन पार्टियों के साथ ब्राह्मण आए उनकी सरकार बनी है। 2007 में बसपा, 2012 में सपा और 2017 में भाजपा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन, नाराज ब्राह्मणों का दावा है कि जितना प्रतिनिधित्व बसपा ने दिया उतनी इन दोनों पार्टियों में तरजीह नहीं मिली।

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नाराजगी के बाद भी बढ़ रहा सतीश चंद्र मिश्रा का कद

बसपा नेता ने बताया कि आप बसपा को करीब से देखें तो समझ आएगा कि सतीश चंद्र मिश्रा का कद तमाम नाराजगी के बाद भी क्यों बढ़ता जा रहा है। वो कहते हैं कि मायावती राजनीति की माहिर खिलाड़ियों में से एक हैं। उनकी राजनीति को समझना बेहद मुश्किल है। उन्होंने कहा कि सतीश चंद्र मिश्रा की तमाम शिकायतें बसपा सुप्रीमो से की जाती हैं। कईयों ने पार्टी भी छोड़ दी लेकिन सतीश चंद्र मिश्रा पर कोई आंच नहीं है। हाल ही में बसपा से निष्कासित किए विधायकों ने भी सतीश चंद्र मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन बसपा ने पहली बार मीडिया सेल (Media Cell) का गठन किया और उसकी कमान सतीश चंद्र मिश्रा को सौंप दी।

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लोकसभा व राज्यसभा में सदन के नेता ब्राह्मण

ब्राह्मणों के बसपा की ओर आकर्षित होने का एक बड़ा कारण यह भी है राज्यसभा (Rajyasabha) और लोकसभा (Loksabha) में सदन के नेता ब्राह्मण समुदाय के ही हैं। लोकसभा में रितेश पांडेय सदन के नेता हैं तो वहीं राज्यसभा में सतीश चंद्र मिश्रा। इन दोनों ही नेताओं की लोकप्रियता अपने समाज में काफी है। रितेश जहां बेहद युवा हैं तो वहीं सतीश चंद्र मिश्रा पुरानी श्रेणी के नेताओं में से है। जबकि, रितेश पांडेय (Ritesh Pandey) के पिता भी पुराने कद्दावर बसपाई नेता हैं।

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ये मुश्किलें भी सामने

ब्राह्मणों के जुड़ने से बसपा 2007 का करिश्मा दोहराने का ख्वाब देख रही है लेकिन क्या यह इतना आसान होगा। इसका जवाब कठिन है। क्योंकि 2007 में बसपा चेहरों के अलावा दूसरे समाज के कई दिग्गज नेता थे जो अब बसपा के साथ नहीं है। उन नेताओं में स्वामी प्रसाद मौर्या (Swami Prasad Maurya), बाबू सिंह कुशवाहा (Babu Singh Kushwaha), नसीमुद्दीन सिद्दीकी (Nasimuddin Siddiqui), राम अचल राजभर (Ram Achal Rajbhar), लालजी वर्मा (Lalji Verma), के के गौतम (K K Gautam), दद्दू प्रसाद (Daddu Prasad) समेत कई बड़े चेहरे शामिल हैं। इतना ही नहीं बसपा छोड़कर कई नेताओं ने अपनी पार्टी भी बना ली है। ऐसे में बसपा के वोट बैंक में बिखराव भी संभव है। सबसे बड़ा नुकसान बसपा को आजाद समाज पार्टी से हो सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) बसपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।

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ऑनलाइन मीटिंग लेंगी बसपा सुप्रीमो

बसपा सुप्रीमो 2022 के रण में कूदने के लिए अपनी तैयारियों को मजबूती देने में जुटी हुईं हैं। इसके लिए वे बैठकों के साथ ऑनलाइन मीटिंग भी लेंगी। सतीश चंद्र मिश्रा इसका पूरा खाका तैयार कर रहे हैं। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनके उपर एक बार फिर ब्राह्मण समाज को जोड़ने की है।

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