6 भगत सिंह की शहादत को करते हैं शत शत प्रणाम

नई दिल्ली। आज 23मार्च हैं यानि शहीद दिवस जिसे हम शहीदों की शहादत को याद करके मनाते हैं और आज भी हम अपने लेख के माध्यम से एक ऐसे शहीद को याद करेगें जिनकी शहादत के चर्चें बच्चें बच्चें की जुबां पर हैं और उनकी शहदात को कोई भी कभी भी भूल नहीं पाएगा जब भी भारत की आजादी की बात की जाएंगी उनका नाम स्वर्ण शब्दों में उजागर किया जाएंगा और जिनहें पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे ही सम्मान के साथ देखेंगी।

आज हम शहीद दिवस के दिन बात कर रहे भगत सिंह की….जी हां वो भगत सिंह जिनका नाम जुंबा पर आते ही उनकी शहादत हमारी आंखो के सामनें आ जाती हैं भले भी हमने उनकों उस दौर में नहीं देखा पर आज भी जब उनका नाम हमारें सामनें लिया जाता हैं तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता हैं क्योकि भगत सिंह भारत की आजादी के लिए जाने जाते हैं आजादी के लिए जाने जाते हैं सिर्फ इतना कहना शायद उनको सही रुप से उजागर ना कर पाए। आज मेरे पास उनकी शहादत को अच्छें से व्यक्त करने के लिए हो सकता हैं कि शब्द कम पड़ जाएं क्योकि भगत सिंह ऐसे शख्स थें जिन्होनें भारत को आजादी दिलाने के लिए अपने प्राणों को हस्तें हस्तें न्यौछावर दर दिए और देश के खातिर फांसी पर चढ़ गए

ऐसे शूरवीर भगत सिंह का जन्म 27  सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में हुआ था जो अब पाकिस्तान में हैं। उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। भगत सिंह का परिवार एक आर्य-समाजी सिख परिवार था। कहते हैं कि ‘पूत के पांव पालने में ही दिखाई पड़ जाते हैं’ इस बात को सच साबित कर दिखाया भगत सिंह ने जी हां…भगत सिंह जब पांच साल के थें तब ही भगतसिंह के खेल भी अनोखे थे। वह अपने साथियों को दो टोलियों में बांट देता था और वे परस्पर एक-दूसरे पर आक्रमण करके युद्ध का अभ्यास किया करते। भगतसिंह के हर कार्य में उसके वीर, धीर और निर्भीक होने का आभास मिलता था। भगत सिंह हमेशा से लाला लाजपत राय को अपनी प्रेऱणा मानते हैं इसलिए शायद जब लाला लाजपत राय की हत्या हुई तो भगत सिंह की ओऱ से इसका विरोध किया गया और इस विरोध के चलते ब्रिटिश सरकार के दांत खट्टें कर दिए गए।

भगत सिंह हमेशा से ही देश सेवा की बात किया करते थे ंऔर बचपन से ही उन्होनें यें ठान रखा था कि भारत को आजादी दिलानी हैां जिसके लिए वो हर संभव कोशिश करते थें इसलिए अंग्रेजों के मन में डर पैदा करने के लिए भगत सिंह राजगुरू और सुखदेव की टोली ने अंग्रेजो को डराना शुरू कर दिया। गत सिंह भारत के आजादी के आंदोलन के ऐसे सिपाही रहे हैं, जिनका जेहन या जुबान पर आते ही शरीर में जोश दौड़ जाता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। खुद को देशभक्ति के जज्बे से भरने के लिए उनका नाम लेना ही काफी है। भगत सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया और असेंबली में बम फेंककर उन्हें सोती नींद से जगाने का काम किया था, असेंबली में बम फेंकने के बाद वे भागे नहीं और जिसके नतीजतन उन्हें फांसी की सजा हो गई. भगत सिंह, उनके साथ राजगुरु और सुखदेव को 23, 1931 को फांसी की सजा सुनाई गई हालाकिं यें फांसी 24 मार्च को देनी थी लेकिन एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई और हंसते-हंसते भगत सिंह अपने दो दोस्त राजगुरू और सुखदेव के साथ शहीद हो गए।

आज हम आपको भगत सिंह की कुछ ऐसी लाइनों को सुनाने जा रहे हैं जो आपके अंदर भी देशभक्ति की भावना को पैदा कर देगा।

1. ‘जिंदगी अपने दम पर जी जाती है… दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं’

2. ‘प्यार हमेशा आदमी के चरित्र को ऊपर उठाता है, यह कभी उसे कम नहीं करता है. प्यार दो प्यार लो.’

3. ‘अगर बहरों को अपनी बात सुनानी है तो आवाज़ को जोरदार होना होगा. जब हमने बम फेंका तो हमारा उद्देश्य किसी को मारना नहीं था. हमने अंग्रेजी हुकूमत पर बम गिराया था. अंग्रेजों को भारत छोड़ना और उसे आजाद करना चाहिए.’

4. ‘मैं एक इंसान हूं और जो कुछ भी इंसानियत को प्रभावित करती है उससे मेरा मतलब है.’

5. ‘प्रेमी, पागल और कवि एक ही चीज से बने होते हैं.‘

6. ‘…लोगों को कुचलकर, वे विचारों का दम नहीं घोंट सकते.’

7. ‘हमारे लिए समझौते का मतलब कभी आत्मसमर्पण नहीं होता. सिर्फ एक कदम आगे और कुछ आराम, बस इतना ही. ’

8. ‘हर वो शख्स जो जो विकास के लिए आवाज बुलंद कर रहा है उसे हरेक रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी, उसमे अविश्वास जताना होगा और उसे चुनौती देनी होगी.’

9. ‘आम तौर पर लोग चीजें जैसी हैं उसी के अभ्यस्त हो जाते हैं. बदलाव के विचार से ही उनकी कंपकंपी छूटने लगती है. इसी निष्क्रियता की भावना को क्रांतिकारी भावना से बदलने की दरकार है.’

10. ‘वे मुझे कत्ल कर सकते हैं, मेरे विचारों को नहीं. वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं लेकिन मेरे जज्बे को नहीं.’

आज शहीद दिवस के मौके पर हम भी इन शूरवीरों की शहादत को  याद करते हैं। आज तीन ऐसे शूरवीर हमेशा के लिए शहीद हो गए जो हमेशा हमारें अंदर जिंदा हैं औऱ जिंदा रहेगें।

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